मैक्सिम गोर्की

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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मैक्सिम गोर्की

(Maxim Gorky)

(1868-1936)

मैक्सिम गोर्की (रूसी भाषा में उच्चारण मक्सीम गोर्की) (२८ मार्च १८६८ - १८ जून १९३६) रूस/सोवियत संघ के प्रसिद्ध लेखक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता थे। उनका असली नाम "अलिक्सेय मक्सीमविच पेश्कोव" (रूसी भाषा में - Алексе́й Макси́мович Пе́шков or Пешко́в) था। उन्होने "समाजवादी यथार्थवाद" (socialist realism) नामक साहित्यिक परिभाषा की स्थापना की थी। सन् १९०६ से लेकर १९१३ तक और फिर १९२१ से १९२९ तक वे रूस से बाहर (अधिकतर, इटली के कैप्री (Capri) में) रहे। सोवियत संघ वापस आने के बाद उन्होने उस समय की सांस्कृतिक नीतियों को स्वीकार किया

 

 

 

 

Maa Ka Hridya

 

 

Semaga

 

 

 

मैक्सिम गोर्की
कब्रिस्तान के मुफलिसों के घेरे में पत्तियों से ढकी और बारिश तथा हवा में ढेर बनी समाधियों के बीच एक सूती पोशाक पहने और सिर पर काला दुशाला डाले, दो सूखे भूर्ज वृक्षों की छाया में एक स्त्री बैठी है। उसके सिर के सफेद बालों की एक लट उसके कुम्हलाये गाल पर पड़ी है। उसके मजबूती से बंद होठों के सिरे कुछ फूले हुए-से हैं, जिससे मुहं के दोनों ओर शोक-सहूचक रेखाएं उभर आई है। आंखों की उसकी पलके सूजी हुई हैं, जैसे वह खूब रोई हो और कई लम्बी रातें उसकी जागते बीती हों।
मैं उससे कुछ ही फासले पर खड़ा देख रहा था, पर वह गुमसुम बैठी रही और जब मैं उसके नजदीक पहुंच गया तब भी उसमें कोई हलचल पैदा नहीं हुईं। महज अपनी बुझी हुई आंखों को उठाकर उसने मेरी ओर देखा और मेरे पास पहुंच जाने से जिस उत्सुकता, झिझक अथवा भावावेग की आशा की जाती थीं, उसे तनिक भी दिखाये बिना वह नीचे की ओर ताकती रही।
मैंने उसे नमस्कार किया। पूछा, "क्यों बहन, यह सामधि किसकी है?"
"मेरे लड़के की।" उसने बहत ही बेरुखी से जवाब दिया।
"क्या वह बहुत बड़ा था?"
"नहीं, बारह साल का था।"
"उसकी मौत कब हुई?"
"चार साल पहले।"
स्त्री ने दीर्घ निश्वास छोड़ी और अपने बालों की लट को दुशाले के नीचे कर लिया। उस दिन बड़ी गर्मी थी। मुर्दो की उस नगरी पर सूरज बड़ी बेरहमी से चमक रहा था। कब्रो पर जो थोड़ी बहुत घास उग आई थी। वह मारे गर्मी और धूल के पीली पड़ गई थी और सलीबों के बीच यत्र-तत्र धूल से भरे पेड़ ऐसे चुपचाप खड़े थे, मानों मौत ने उन्हें भी अपने सांये में ले लिया हो।
लड़के की सामधि की ओर सिर से इशारा करते हुए मैने पूछा, "उसकी मौत कैसे हुई?"
"घोड़ो की टापों से कुचलने से।" उसने गिने-चुने शब्दों में उत्तर दिया और समाधि को जैसे सहलाने के लिए झुर्रियों से भरा अपना हाथ उस ओर बढ़ा दिया।
"ऐसा कैसे हुआ?"
जानता था कि मैं अभद्रता दिखा रहा था, लेकिन उस स्त्री को इतना गुमसुम देखकर मेरा मन कुछ उत्तेजित और कुद खीज से भर उठा था। मेरे अन्दर सनक पैदा हुई कि उसकी आंखों में आंसू देखूं। उसकी उदासीनता में अस्वाभाविकता थी पर मुझे लगा कि वह उस ओर से बेसुध थी।
मेरे सवाल पर उसने अपनी आंखें ऊपर उठाई और मेरी ओर देखा। फिर सिर से पैर तक मुझे पर निगाह डालकर उसने धीरे-से आह भरी और बड़े मंद स्वर में अपनी कहानी कहनी शुरू की:
"घटना इस तरह घटी। इसके पिता गबन के मामले में डेढ़ साल के लिए जेल चले गये थे। हमारे पास जो जमा पूंजी थीं वह इस बीच खर्च हो गई। बचत की कमाई ज्यादा तो थी नहीं। जिस समय तक मेरा आदमी जेल से छूटा हम लोग घास जलाकर खाना पकाते थे। एक माली गाड़ी भर वह बेकार घास मुझे दे गया था। उसे मैंने सुखा लिया था और जलाते समय उसमें थोड़ा बुरादा मिला लेती थी। उसमें बड़ा ही बुरा धुआं निकलता था और खाने के स्वाद को खराब कर देता था। कोलूशा स्कूल चला जाता था। वह बड़ा तेज लड़का था और बहुत ही किफायतशार था। स्कूल से घर लौटते समय रास्ते में जो भी लट्ठे- लकड़ी मिल जाते थे, ले आता था। वंसत के दिन थे। बर्फ पिघल रही थी। और कोलूशा के पास पहनने को सिर्फ किरमिच के जूते थे। जब वह उन्हें उतारता था तो उसके पैर मारे सर्दी के लाल-सुर्ख हो जाते थे।
"उन्हीं दिनों उन लोगों ने लड़के के पिता को जेल से रिहा कर दिया और गाड़ी में घर लाये। जेल में उसे दिल का दौरा पड़ गया था। वह बिस्तर पर पड़ा मेरी ओर ताक रहा था। उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कराहट थी। मैंने उस पर निगाह डाली और मन-ही मन सोचा, 'तुमने मेरी यह हालत कर दी है! और अब मैं तुम्हारा पेट कैसे भरूंगी? तुम्हें
कीचड़ में पटक दूं। हां, मैं ऐसा ही करना चाहूंगी।
" लेकिन कोलूशा ने उसे देखा तो बिलख उठा। उसका चेहरा जर्द हो गया और बड़े बड़े आंसू उसके गालों पर बहने लगे। मॉँ, इनकी ऐसी हालत क्यों है?' उसने पूछा। मैंने कहा, यह अपना जीना जी चुके हैं'
"उस दिन के बाद से हमारी हालत बदतर होती गई। मैं रात दिन मेहनत करती, लेकिन अपना खून सुखा करके भी बीस कापेक से ज्यादा न जुट पाती और वह भी रोज नहीं, खुशकिस्मत दिनों में। यह हालत मौत से भी गई-बीती थी और मैं अक्सर अपनी जिन्दगी का खात्मा कर देना चाहती।
"कोलूशा यह देखता और बहुत परेशान होकर इधर-से-उधर भटकता। एक बार जब मुझे लगा कि यह सब मेरी बर्दाश्त से बाहर है तो मैंने कहा, 'आग लगे मेरी इस जिंदगी को! मैं मर क्यों नहीं जाती! तुम लोगों में से भी किसी की जान क्यों नहीं निकल जाती?'मेरा इशारा कोलूशा और और उसके पिता की ओर थ।
"उसके पिता ने सिर हिलाकर बस इतना कहा, मैं जल्दी ही चला जाऊंगा। मुझे जली कटी मत कहो। थोड़ा धीरज रक्खो।'
"लेकिन कोलूशा देर तक मेरी ओर ताकता रहा, फिर मुड़ा और घर से बाहर चला गया।
"वह जैसे ही बाहर गया, मुझे अपने शब्दों पर अफसोस होने लगा, पर अब हो क्या सकता था! तीर छूट चुका था।
"एक घंटा भी नहीं बीता होगा कि घोड़े पर सवार एक सिपाही आया।'क्या आप गौसपोजा शिशीनीना हैं?' उसने पूछा। मेरा दिल बैठने लगा। उसने आगे कहा, 'तुम्हें अस्पताल में बुलाया है। सौदागर ण्नोखिन के घोड़ों ने तुम्हारे बेटे को कुचल डाला है।'
"मैं फौरन गाड़ी में अस्पताल के लिए रवाना हो गई। मुझे लग रहा था, मानो किसी ने गाड़ी की सीट पर जलते कोयले बिछा दिये हैं" मैं अपने को कोस रही थी—अरी कम्बख्त, तुने यह क्या कर डाला!'
"आखिर हम अस्पताल पहुंचे। कोलूशा बिस्तर पर पड़ा था। उसके सारे बदन पर पट्टियां बंधी थीं। वह मेरी तरफ देखकर मुस्कराया! उसके गालों पर आंसू बहने लगे! धीमी आवाज में उसने कहा, 'मां, मुझे माफ करो। पुलिस के आदमी पैसे ले लिये हैं।'
"तुम किन पैसों की बात कर रहे हो, कोलूशा?" मैंने पूछा।
"वह बोला, अरे, वे पैसे, जो लोगों ने और एनोखिन ने मुझे दिये थे।'
"मैने पूछा, 'उन्होंने तुम्हें पैसे क्यों दिये?'
"उसने कहा, 'इसलिए...'
"उसने धिरे से आह भरी। उसकी आंखें तश्तरी जैसी बड़ी हो रही थीं।
'कोलूशा!' मैंने कहा, 'यह क्या हुआ कि तुमने घोड़े आते हुए नहीं देखे!'
"उसने साफ आवाज में हका, 'मां मैंने घोड़े आते देखे थे, लेकिन मेरे ऊपर से निकल जायंगे तो लोग मुझे जयादा पैसे देंगे, और उन्होंने दिये भी।'
"ये उसके शब्द थे। मैं सबकुछ समझ गई, सबकुछ समझ गई कि उस फरिश्ते लाल ने ऐसा क्यों किया; लेकिन अब तो कुछ भी नहीं किया जा सकता था।
"अगले दिन सबेरे ही वह मर गया। आखिरी सांस लेने तक उसकी चेतना बनी रही और वह बार-बार कहता रहा 'डैडी के लिए यह खरी लेना, वह खरी लेना और मां अपने लिए भी, 'जैसेकि उसके सामने पैसा-ही पैसा हो। वास्तव में सौंतालिस रूबल थे।
"मैं एनोखिन के पास गई; लेकिन मुझे कुल जमा पांच रूबल दिये और वे भी गड़बड़ा कर उसने कहा, 'लड़के ने अपने को घोड़े के बीच झोंक दिया। बहुत-से लोगों ने देखा। इसलिए तुम किस बात की भीख मांगने आई हो? मैं फिर कभी घर वापस नहीं गई। भैया, यह है सारी दास्तान!'
कब्रिस्तान में खामोशी और सन्नटा छाया था। सलीब, रोगी-जैसे पेड़, मिट्टी के ढेर और कब्र पर इतने दुखी भाव से गुमसुम बैठी वह स्त्री—इस सबसे मैं मृत्यु और इन्सानी दुख के बारे में सोचने लगा।
लेकिन आसमान साफ था और धरती पर ढलती गर्मी की वर्षा कर रहा था।
मैंने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और उस स्त्री को ओर बढ़ा दिये, जिसे तकदीर ने मार डाला था, फिर भी वह जिये जा रही थी।
उसने सिर हिलया और बहुत ही रुकते-रुकते कहा, "भाई, तुम अपने को क्यों हैरान करते हो! आज के लिए मेरे पास बहुत हैं। अब मुझे ज्यादा की जरूरत भी नहीं है। मैं अकेली हूं-दुनिया में बिलकुल अकेली।"
उसने एक लम्बी सांस ली और फिर मुंह पर वेदना से उभरी रेखाओं के बीच अपने पतले होंठ बन्द कर लिये।

 


:: अनुवाद : प्रेमचन्‍द गांधी ::

मुझे एक बार मेरी जान-पहचान वाले एक व्‍यक्ति ने यह घटना बताई थी।

उन दिनों में मास्को में पढ़ता था। मेरे पड़ोस में एक ऐसी महिला रहती थी, जिसकी प्रतिष्‍ठा को वहां सन्दिग्ध माना जाना था। वह पोलैंड की रहने वाली थी और उसका नाम टेरेसा था। मर्दों की तरह लम्बा कद, गठीला डील-डौल, काली घनी भौंहे, जानवरों जैसी चमकती काली आंखें, भारी आवाज, कोचवान जैसी चाल, बेहद ताकतवर मांसपेशियां और मछुआरे की बीवी जैसा उसका रंग-ढंग, उसके व्यक्तित्व को मेरे लिए खौफनाक बनाते थे। मैं बिल्कुल ऊपर रहता था और उसकी बरसाती मेरे ठीक सामने थी। जब वह घर पर होती तो मैं कभी भी अपना दरवाजा खुला नहीं छोड़ता था। कभी-कभार हम सीढिय़ों पर या आँगन में मिलते और वह ऐसे चालाक सनकीपने से मुस्कुराती कि मैं अपनी मुस्‍कुराहट छुपा लेता। अक्सर वह मुझे नशे में धुत मिलती और उसकी आंखों में उनींदापन, बालों में अस्त-व्यस्तता दिखाई देती और ख़ास तौर पर वीभत्स ठहाके लगाती रहती। ऐसे में वह मुझसे जरुर बात करती।
'और कैसे हो मि. स्टूडेन्ट’ कहते ही उसकी वीभत्स हंसी उसके प्रति मेरी नफरत को और बढ़ा देती। मैंने उससे ऐसी खैफनाक मुलाकातें टालने के लिए कई बार यह कमरा छोडऩे का विचार किया, लेकिन मुझे अपना छोटा-सा आशियाना बहुत प्यारा लगता था। उसकी खिड़की से बाहर का दृश्य बहुत खूबसूरत लगता था और वहां काफी शांति थी, इसलिए मैंने इस कष्ट को सहन करना स्वीकार कर लिया।

और एक सुबह जब मैं अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा क्लास से गैर-हाजिरी का बहाना तलाश कर रहा था, ठीक उसी समय दरवाजा खुला और टेरेसा की भारी आवाज ने मेरी चेतना को झकझोर दिया।

'तबीयत तो ठीक है मि. स्टूडेन्ट?’
'क्या चाहिए आपको?’ मैंने पूछा और देखा कि उसके चेहरे पर कुछ असमंजस के भाव तैर गए हैं और साथ ही कुछ विनम्रता भी... मेरे लिए उसके चेहरे की यह मुद्रा बिल्‍कुल अजनबी-सी थी।
'सर, मैं आपसे कुछ मदद मांगने आई हूं, निराश तो नहीं करेंगे?’
मैं चुपचाप पड़ा रहा और खुद से ही कहने लगा, 'हे दयानिधान करुणानिधान उठो!’
'मुझे घर पर एक चिट्ठी भेजनी है। बस इतना-सा निवेदन है।‘ उसने कहा। उसकी कोमल-कातर आवाज़ में जैसे जल्‍दी से यह काम कर देने की प्रार्थना थी।
'रक्षा करना भगवान’, मैंने मन ही मन अपने ईश्‍वर से कहा और उठकर अपनी मेज तक आया। एक कागज उठाया और उससे कहा, 'इधर आकर बैठिए और बताइये क्या लिखना है?’
वह आई, बहुत ही सावधानी के साथ कुर्सी पर बैठी और मेरी तरफ अपराध-भाव से देखने लगी।
'अच्छा तो किसके नाम चिट्ठी लिखवाना चाहती हैं आप?’
'बोसेलाव काशपुत के नाम, कस्बा स्वीजियाना, बारसा रोड।‘
'ठीक है, जल्दी से बताइये क्या लिखना है?’
'माई डियर बोल्स... मेरे प्रियतम...मेरे विश्वस्त प्रेमी। भगवान तुम्हारी रक्षा करे। हे सोने जैसे खरे दिल वाले, तुमने इतने दिनों से इस छोटी-सी दुखियारी बतख, टेरेसा को चिट्ठी क्‍यों नहीं लिखी?’
मेरी हंसी निकलते-निकलते रह गई। 'एक छोटी-सी दुखियारी बतख। पांच फुट से भी लम्बी, पत्थर की तरह सख्त और भारी चेहरा इतना काला कि बेचारी छोटी बतख जैसे जिन्दगी भर किसी चिमनी में रही हो और कभी नहाई ही नहीं हो। किसी तरह खुद की हंसी पर काबू पाकर मैंने पूछा, 'कौन है यह मि. बोलेस?’
‘बोल्‍स, मि. स्‍टूडेंट’, उसने इस तरह कहा मानो मैंने उसका नाम पुकारने में कोई बड़ी बेहूदगी कर दी हो।

'वह बोल्‍स है, मेरा नौजवान आदमी।‘
'नौजवान आदमी।‘
'आपको आश्चर्य क्यों हो रहा है? मैं, एक लड़की, क्या मेरा नौजवान आदमी नहीं हो सकता?’

वह और एक लड़की? ठीक है।
'ओह, क्यों नहीं? इस दुनिया में सब कुछ संभव है और क्‍या यह नौजवान बहुत लंबे समय से आपका आदमी है?’ मैंने पूछा।
'छह साल से।‘
'ओह, हां, तो चलिए आपकी चिट्ठी लिखते हैं।‘ और मैंने चिट्ठी लिख दी।
लेकिन मैं आपको एक बात बिल्‍कुल साफ़ तौर पर बता दूं कि मैं चाहता तो इस पत्राचार में अगर जानबूझकर भी बहुत-सी चीज़ें बदल देता, बशर्ते यहां टेरेसा के अलावा कोई और चाहे जैसी भी लड़की होती।‘

'मैं तहेदिल से आपकी शुक्रगुजार हूं। उम्मीद करती हूं कि कभी मैं भी आपके काम आ सकूं।‘ टैरेसा ने बहुत सौजन्‍य और सद्भाव के साथ कहा।
'नहीं इसकी कोई जरुरत नहीं, शुक्रिया।‘
'शायद आपकी कमीज़ और पतलूनों को मरम्मत की जरुरत हो, मैं कर दूंगी।‘
मुझे लगा कि इस हथिनी जैसी महिला ने मुझे शर्मसार कर दिया और मैंने विनम्रतापूर्वक उससे कहा कि मुझे उसकी सेवाओं की कोई जरुरत नहीं है। सुनकर वह चली गई।
एक या दो सप्‍ताह गुज़रे होंगे कि एक दिन शाम के वक्‍त मैं खिड़की पर बैठा सीटी बजा रहा था और खुद से ही कहीं बहुत दूर जाने की सोच रहा था। मैं बिल्‍कुल बोर हो गया था। मैसम बड़ा खराब था और मैं बाहर नहीं जाना चाहता था। मैं अपने बारे में आत्‍म-विश्‍लेषण और चिंतन की प्रक्रिया में डूबा हुआ था। हालांकि यह भी निहायत ही बकवास काम था, लेकिन मुझे इसके अलावा कुछ और करने की सूझ ही नहीं रही थी। उसी समय दरवाज़ा खुला। हे भगवान तेरा शुक्रिया। कोई भीतर आया।
'हैलो मि. स्टूडेन्ट, कुछ खास काम तो नहीं कर रहे आप?’
यह टैरेसा थी, हुंह...।

'नहीं, क्या बात है?’
'मैं पूछ रही थी कि क्या आप मेरे लिए एक और चिट्ठी लिख देंगे?’
'अच्छा, मि. बोल्स को?’
'नहीं, इस बार उनकी तरफ से।‘
'क्या... क्‍या मतलब?’
'ओह मैं भी बेवकूफ हूं। माफ करें, मेरी एक जान पहचान वाले हैं पुरुष मित्र। मेरी जैसी ही उनकी भी एक प्रेमिका है टेरेसा। क्या आप उस टेरेसा के लिए एक चिट्ठी लिख देंगे?’
मैंने देखा, वह तनाव में थी, उसकी अंगुलियां कांप रही थीं।... पहले तो मैं चकरा गया था, फिर मामला मेरी कुछ समझ में आया।
मैंने कहा, 'देखिए मोहतरमा, न तो कोई बोल्स है और न ही टेरेसा। आप अब तक मुझसे झूठ पर झूठ बोलती जा रही हैं। छल किए जा रही हैं। क्‍या आप मेरी जासूसी करने नहीं आ रही हैं? मुझे आपसे पहचान बढ़ाने में या आपकी जान-पहचान वालों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। समझीं आप?’
और अचानक वह बुरी तरह घबरा कर परेशान हो गई। वह कभी इस पांव पर तो कभी उस पांव पर खड़ी होकर अजीब ढंग से बड़बड़ाने लगी। लग रहा था जैसे वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन कह नहीं पा रही थी। मुझे लगा, मैंने उस पर सन्देह करके बहुत गलत किया है। यह तो शायद कोई और ही बात थी।

वह 'मि. स्टूडेन्ट’ कहकर अचानक अपना सिर हिलाती हुई पलटी और दरवाजे से बाहर निकल कर अपने कमरे में चली गई। मैं अपने कमरे में दिमाग में उमड़ रहे अप्रीतिकर भावों के साथ जड़वत रह गया। एक भयानक आवाज के साथ उसका दरवाजा बन्द होने की आवाज आई। मुझे काफी दुख हुआ और लगा कि मुझे उसके पास जाकर सारा मामला सुलझा लेना चाहिए। उसे जाकर बुलाना चाहिए और वो जो चाहती है, उसके लिए लिख देना चाहिए।
मैं उसके कमरे में गया। वह घुटनों पर झुकी हाथों में सिर पकड़े बैठी थी। 'सुनिये’

अब देखिए मैं जब भी अपनी कहानी के इस बिंदु पर आता हूं तो हमेशा मेरी बहुत अजीब हालत हो जाती है और मैं बहुत मूर्खतापूर्ण महसूस करने लगता हूं। ‘मेरी बात सुनेंगी आप?’ मैंने कहा।
वह उठी, आंखें चमकाती हुईं मुझ तक आई और मेरे कंधों पर हाथ टिकाते हुए अपनी खरखरी आवाज में फुसफुसाती हुई बोली, 'देखिये, बात यह है कि न तो सच में कोई बोल्स है और न ही टेरेसा। लेकिन इससे आपको क्या ? आपको तो एक कागज पर कुछ लिखने में ही तकलीफ होती है। कोई बोल्स नहीं और न ही टेरेसा, सिर्फ मैं हूं। और आपके पास ये जो दोनों हैं, इनसे आप जो कुछ अच्‍छा चाहें, कर सकते हैं।‘
'माफ कीजिए।‘ मैंने कहा, 'यह सब क्या है? आप कहती हैं कोई बोल्स नहीं है?’
'हां।‘
'और कोई टेरेसा भी नहीं?’
'हां, कोई और टैरेसा नही, बस मैं ही टेरेसा हूं।‘
मैं कुछ भी नहीं समझ पाया। मैंने अपनी निगाहें उस पर टिका दीं और सोचने लगा कि दोनों में से पहले कौन आगे बढ़कर कोई हरकत करता है। लेकिन वही पहले मेज तक गई, कुछ तलाश किया और मेरे पास आकर शिकायती मुद्रा में उलाहने के साथ कहने लगी 'अगर आपको बोल्स के नाम चिट्ठी लिखने में तकलीफ हुई तो यह रहा आपका लिखा कागज। दूसरे लोग लिख देंगे मेरे लिए।‘

मैंने देखा उसके हाथ में बोल्‍स के नाम मेरे हाथों लिखा हुआ पत्र था। ओफ्फो...।
'सुनिए मैडम, आखिर इस सबका क्या मतलब है? आप क्यों दूसरों के पास पत्र लिखवाने के लिए जायेंगी? यह तो पहले ही लिखा हुआ है और आपने इसे अभी तक भेजा भी नहीं?’
'कहां भेजती?’
'क्यों? मि. बोल्स को।‘
‘ऐसा कोई शख्स है ही नहीं।‘
मैं कुछ नहीं समझ पाया। फिर उसने बताना शुरू किया।
'बात यह है कि ऐसा कोई इंसान है ही नहीं।‘ और फिर उसने अपने हाथ कुछ इस तरह फैलाते हुए कहा, जैसे उसे खुद ही यकीन नहीं कि ऐसा कोई इन्‍सान है ही नहीं।

‘लेकिन मैं चाहती हूं कि वो हो ।... क्या मैं औरों की तरह इंसान नहीं हूं? हां, हां, मैं अच्‍छी तरह जानती हूं कि वह नहीं है कहीं भी... लेकिन किसी को भी ऐसे शख्‍स को चिट्ठी लिखने में क्या और क्‍यों तकलीफ होती है?’
'माफ कीजिए- किसे?’
'मि. बोल्स को और किसे?’
'लेकिन वह तो है ही नहीं- उसका कोई अस्तित्व नहीं।‘
'हे भगवान, क्या फर्क पड़ता है अगर वह नहीं है। उसका कोई अस्तित्व नहीं, लेकिन हो तो सकता है। मैं उसे लिखती हूं और इससे लगता है कि वो है और टेरेसा, जो मैं हूं, उसे वह जवाब देता है और मैं फिर उसे लिखती हूं।‘
और आखिरकार मेरी कुछ समझ में आया। मेरे पास एक ऐसी इंसानी शख्सियत खड़ी थी, जिसे दुनिया में प्यार करने वाला कोई नहीं था और जिसने ख़ुद अपने लिए एक दोस्त ईजाद कर लिया था।
'देखिए, आपने बोल्स के नाम एक चिट्ठी लिखी। मैं इसे किसी के पास ले जाती और वह इसे पढ़कर सुनाता तो मुझे लगता कि बोल्स है। और मैंने आपसे टेरेसा के नाम पत्र लिखने के लिए कहा था, उसे लेकर मैं किसी के पास जाती और उसे सुनते हुए मुझे विश्वास हो जाता कि बोल्स जरुर है और जिन्दगी मेरे लिए थोड़ी सहज-सरल हो जाती।‘
‘हे ईश्‍वर, मुझे अपनी शरण में ले लो।‘ उसकी बातें सुनकर मैंने अपने आप से ही कहा।
उस दिन के बाद से मैं नियमित रुप से सप्‍ताह में दो बार उसके लिए चिट्ठियां लिखने लगा। बोल्स के नाम और बोल्स की तरफ से टेरेसा को। वह उन्हें सुनती और रोने लग जाती। काल्पनिक बोल्स के वास्तविक पत्रों से आंसुओं में डूब कर उसने मेरे कपड़ों की मरम्मत का जिम्मा ले लिया। लगभग तीन महीने के इस सिलसिले के बाद उन्होंने उसे जेल भेज दिया। अब तो वह निश्चित तौर पर मर चुकी होगी।

इतना कहकर मेरे परिचित ने सिगरेट की राख़ झाड़ते हुए अपनी बात समाप्‍त करते हुए कहा।

बहरहाल, इंसान जितनी कड़वी चीजें चख लेता है, जीवन में उसे मीठी चीजें चखने के बाद उनकी उतनी ही भूख बढ़ती जाती है। और हम अपनी नियति में लिपटे हुए लोग इस बात को कभी नहीं समझ सकते।

और फिर तमाम चीजें बेहद मूर्खतापूर्ण और क्रूर नज़र आने लगती हैं। जिन्‍हें हम वंचित वर्ग कहते हैं, वे कौन हैं आखिर... मैं जानना चाहता हूं। वे हैं हमारे जैसे ही एक ही मांस, मज्‍जा और रक्‍त से बने लोग... यह बात हमें युगों से बताई जा रही है। और हम इसे सच में बस सुनते आए हैं... और सिर्फ शैतान ही जानता है कि यह कितना घिनौना सच है?... क्‍या हम मानवतावाद के प्रवचनों से पूरी तरह दूर भाग चले हैं?... लेकिन वास्‍तविकता में हम सब भी बेहद गिरे हुए और पतित लोग हैं। और जितना मैं समझ पाया हूं उसके अनुसार हम आत्‍मकेंद्रीयता और अपनी ही श्रेष्‍ठता के भावबोध के रसातल में पहुंच चुके हैं। लेकिन बहुत हो चुका यह सब... यह सब पर्वतों जितना ही पुराना है और इतना पुराना कि अब तो इसके बारे में बात करने पर भी शर्म महसूस होती है। बहुत-बहुत पुरानी बीमारी है यह सच में...

 

 

मैक्सिम गोर्की का पत्र रूसी कामरेडों के नाम

1 जनवरी, 1906

कामरेड,

गरीबी की क्रूरता के विरुद्ध संघर्ष का अर्थ है, दुनिया में फैले उत्पीडऩ के जाल से मुक्ति के लिए छेडी गई जंग, और ढेरों असभ्य विरोधाभासों से भरी इस लड़ाई को लोग बहुत ही कमजोर तरीके से लड़ रहे हैं. आप पुरुषोचित तरीके से पूरी ताकत के साथ इस जाल को काटने की कोशिशों में लगे हैं, उधर आपके दुश्मन आपकी कोशिशों को तोडऩे और आप को हर संभव तरीके से इस जाल में और बुरी तरह घेरने की फिराक में हैं.

आपके पास हथियार के रूप में सत्य की तेज तलवार है, जब कि आपके दुश्मनों के हाथ में असत्य की बर्छी. सोने की चमक से चुंधियाए वे कमीने केवल ताकत में यकीन रखते हैं. और यह नहीं समझते कि धीरे-धीरे बढ़ती यह चमक एकता के इस महान आदर्श को जला कर रख देगी कि सभी मुक्त कामगार एक कॉमरेड परिवार के सदस्य हैं.

समाजवाद मुक्ति, समानता और भाई-चारे का धर्म है पर यह बात उनकी समझ से उसी तरह परे है जैसे एक गूंगे- बहरे आदमी के लिए संगीत या फिर एक मूर्ख के लिए कविता. जब वे लोग आजादी और प्रकाश की ओर जनसमुदाय को उमड़ते देखते हैं तो उन्हें अपनी शांति भंग होने का खतरा सताने लगता है. लोगों की जिंदगी के सरमाएदार के रूप में उनकी जो जगह बनी हुई है उन्हें वह हिलती, छिनती- सी लगती है. वे सच छिपाने लगते हैं यहां तक कि अपने बीच एक दूसरे से भी और खुद को न्याय को पराजित करने की खोखली आशा के साथ सांत्वना देते रहते हैं.

वे सर्वहारा वर्ग को बेहद अपमानजनक तौर पर भूखे काले जानवरों का हुजूम कहते हैं. उनके अनुसार इन भूखे जानवरों की इच्छा भारी मात्रा में भोजन हड़पने की है और अगर इनके राक्षसी जबड़े रोटियों से नहीं भरे गए तो ये सब कुछ तबाह करने को तैयार हैं. धर्म और विज्ञान वे उपकरण हैं, जिसका प्रयोग वे लोगों को लगातार दास बनाए रखने के लिए करते हैं.

उन्होंने इसके लिए ही राष्ट्रवाद और एंटी सेमेटिकवाद की खोज की, ऐसे जहर ढूंढ़े जो आप सभी के आपसी भाईचारे वाले रिश्तों और आपकी आस्था को विषाक्त कर दें, यहां तक कि भगवान भी यहां संपत्ति के अभिभावक के रूप में केवल बुर्जुआ की तरह मौजूद हैं. रूस में एक क्रांति की ज्वाला फूट पड़ी है, जबकि वे बुनियादी तौर पर मजदूर शक्ति से संगठित रूसी सर्वहारा वर्ग की बेतहाशा निंदा किए जा रहे हैं - एक बर्बर झुंड, जो कुछ भी अस्तित्व में है उसको बर्बाद कर देने पर तुली ऐसी भीड़ जो अराजकता पैदा करने के अलावा कुछ भी और करने में समर्थ नहीं है.

यह आदमी जो आपको संबोधित कर रहा है, वह जनता का आदमी है और जिसने आज तक लोगों के साथ अपने संबंध नहीं तोड़े हैं, वह जिसने खुले दिमाग से रूसी सर्वहारा के मुक्तिसंघर्ष को देखा है, वह आदमी आपके सामने घोषणा करता है. रूसी सर्वहारा अपनी तत्काल आवश्यकता यानी राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और वह अपनी ताकत से सरकार द्वारा घोषित 30 अक्टूबर के घोषणापत्र को पलट देंगे. वे इस घोषणापत्र को सम्राट की निजी इच्छा पूरी करने का काम बताते हैं, यह उनका सच है, यह जनता पर जीत की एक ट्रॉफी थी.

लेकिन हमारी सरकार ने मनमाने ढंग से शासन करने की आदत बना ली है. जिंदाबाद, सर्वहारा वर्ग जिस तरह से आगे बढ़ रहा है वह पूरी दुनिया को बदल कर रख देगा.जिन हाथों ने अपने देश को ताकतवर और संपन्न बनाया है, अब वे नई जिंदगी गढ़ रहे हैं! संसार भर के ऐसे सभी मजदूर जिंदाबाद. भविष्य का धर्म समाजवाद,जिंदाबाद.

सेनानियों को नमस्कार, और वे जिन्हें कभी भी सत्य की जीत पर, न्याय की जीत पर भरोसा रहा है! सब देशों के कामगारों को बधाई! समानता और स्वतंत्रता के महान आदर्शों से संयुक्त मानवता, जिंदाबाद! एम. गोर्की

 

 

उसका प्रेमी
(Her Lover)

मुझे एक बार मेरी जान-पहचान वाले एक व्यहक्ति ने यह घटना बताई थी।

उन दिनों मैं मास्को में पढ़ता था। मेरे पड़ोस में एक ऐसी महिला रहती थी,जिसकी प्रतिष्ठाम को वहां सन्दिग्ध माना जाना था। वह पोलैंड की रहने वाली थी और उसका नाम टेरेसा था। मर्दों की तरह लम्बा कद, गठीला डील-डौल,काली घनी भौंहे, जानवरों जैसी चमकती काली आंखें, भारी आवाज,कोचवान जैसी चाल, बेहद ताकतवर मांसपेशियां और मछुआरे की बीवी जैसा उसका रंग-ढंग, उसके व्यक्तित्व को मेरे लिए खौफनाक बनाते थे। मैं बिल्कुल ऊपर रहता था और उसकी बरसाती मेरे ठीक सामने थी। जब वह घर पर होती तो मैं कभी भी अपना दरवाजा खुला नहीं छोड़ता था। कभी-कभार हम सीढिय़ों पर या आँगन में मिलते और वह ऐसे चालाक सनकीपने से मुस्कुराती कि मैं अपनी मुस्कुँराहट छुपा लेता। अक्सर वह मुझे नशे में धुत मिलती और उसकी आंखों में उनींदापन,बालों में अस्त-व्यस्तता दिखाई देती और ख़ास तौर पर वीभत्स ठहाके लगाती रहती। ऐसे में वह मुझसे जरुर बात करती।

'और कैसे हो मि. स्टूडेन्ट’ कहते ही उसकी वीभत्स हंसी उसके प्रति मेरी नफरत को और बढ़ा देती। मैंने उससे ऐसी खैफनाक मुलाकातें टालने के लिए कई बार यह कमरा छोडऩे का विचार किया, लेकिन मुझे अपना छोटा-सा आशियाना बहुत प्यारा लगता था। उसकी खिड़की से बाहर का दृश्य बहुत खूबसूरत लगता था और वहां काफी शांति थी, इसलिए मैंने इस कष्ट को सहन करना स्वीकार कर लिया।

और एक सुबह जब मैं अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा क्लास से गैर-हाजिरी का बहाना तलाश कर रहा था, ठीक उसी समय दरवाजा खुला और टेरेसा की भारी आवाज ने मेरी चेतना को झकझोर दिया।

'तबीयत तो ठीक है मि. स्टूडेन्ट?’

'क्या चाहिए आपको?’ मैंने पूछा और देखा कि उसके चेहरे पर कुछ असमंजस के भाव तैर गए हैं और साथ ही कुछ विनम्रता भी... मेरे लिए उसके चेहरे की यह मुद्रा बिल्कुंल अजनबी-सी थी।

'सर, मैं आपसे कुछ मदद मांगने आई हूं, निराश तो नहीं करेंगे?’

मैं चुपचाप पड़ा रहा और खुद से ही कहने लगा, 'हे दयानिधान करुणानिधान उठो!’

'मुझे घर पर एक चिट्ठी भेजनी है। बस इतना-सा निवेदन है।‘ उसने कहा। उसकी कोमल-कातर आवाज़ में जैसे जल्दीन से यह काम कर देने की प्रार्थना थी।

'रक्षा करना भगवान’, मैंने मन ही मन अपने ईश्वदर से कहा और उठकर अपनी मेज तक आया। एक कागज उठाया और उससे कहा, 'इधर आकर बैठिए और बताइये क्या लिखना है?’

वह आई, बहुत ही सावधानी के साथ कुर्सी पर बैठी और मेरी तरफ अपराध-भाव से देखने लगी।

'अच्छा तो किसके नाम चिट्ठी लिखवाना चाहती हैं आप?’

'बोसेलाव काशपुत के नाम, कस्बा स्वीजियाना, बारसा रोड।‘

'ठीक है, जल्दी से बताइये क्या लिखना है?’

'माई डियर बोल्स... मेरे प्रियतम...मेरे विश्वस्त प्रेमी। भगवान तुम्हारी रक्षा करे। हे सोने जैसे खरे दिल वाले, तुमने इतने दिनों से इस छोटी-सी दुखियारी बतख, टेरेसा को चिट्ठी क्योंम नहीं लिखी?’

मेरी हंसी निकलते-निकलते रह गई। 'एक छोटी-सी दुखियारी बतख। पांच फुट से भी लम्बी, पत्थर की तरह सख्त और भारी चेहरा इतना काला कि बेचारी छोटी बतख जैसे जिन्दगी भर किसी चिमनी में रही हो और कभी नहाई ही नहीं हो। किसी तरह खुद की हंसी पर काबू पाकर मैंने पूछा, 'कौन है यह मि. बोलेस?’

‘बोल्सै, मि. स्टूकडेंट’, उसने इस तरह कहा मानो मैंने उसका नाम पुकारने में कोई बड़ी बेहूदगी कर दी हो।

'वह बोल्सब है, मेरा नौजवान आदमी।‘

'नौजवान आदमी।‘

'आपको आश्चर्य क्यों हो रहा है? मैं, एक लड़की, क्या मेरा नौजवान आदमी नहीं हो सकता?’

वह और एक लड़की? ठीक है।

'ओह, क्यों नहीं? इस दुनिया में सब कुछ संभव है और क्याक यह नौजवान बहुत लंबे समय से आपका आदमी है?’ मैंने पूछा।

'छह साल से।‘

'ओह, हां, तो चलिए आपकी चिट्ठी लिखते हैं।‘ और मैंने चिट्ठी लिख दी।

लेकिन मैं आपको एक बात बिल्कु,ल साफ़ तौर पर बता दूं कि मैं चाहता तो इस पत्राचार में अगर जानबूझकर भी बहुत-सी चीज़ें बदल देता, बशर्ते यहां टेरेसा के अलावा कोई और चाहे जैसी भी लड़की होती।‘

'मैं तहेदिल से आपकी शुक्रगुजार हूं। उम्मीद करती हूं कि कभी मैं भी आपके काम आ सकूं।‘ टैरेसा ने बहुत सौजन्यी और सद्भाव के साथ कहा।

'नहीं इसकी कोई जरुरत नहीं, शुक्रिया।‘

'शायद आपकी कमीज़ और पतलूनों को मरम्मत की जरुरत हो, मैं कर दूंगी।‘

मुझे लगा कि इस हथिनी जैसी महिला ने मुझे शर्मसार कर दिया और मैंने विनम्रतापूर्वक उससे कहा कि मुझे उसकी सेवाओं की कोई जरुरत नहीं है। सुनकर वह चली गई।

एक या दो सप्तालह गुज़रे होंगे कि एक दिन शाम के वक्तर मैं खिड़की पर बैठा सीटी बजा रहा था और खुद से ही कहीं बहुत दूर जाने की सोच रहा था। मैं बिल्कुलल बोर हो गया था। मैसम बड़ा खराब था और मैं बाहर नहीं जाना चाहता था। मैं अपने बारे में आत्म।-विश्लेरषण और चिंतन की प्रक्रिया में डूबा हुआ था। हालांकि यह भी निहायत ही बकवास काम था, लेकिन मुझे इसके अलावा कुछ और करने की सूझ ही नहीं रही थी। उसी समय दरवाज़ा खुला। हे भगवान तेरा शुक्रिया। कोई भीतर आया। 'हैलो मि. स्टूडेन्ट, कुछ खास काम तो नहीं कर रहे आप?’

यह टैरेसा थी, हुंह...।

'नहीं, क्या बात है?’

'मैं पूछ रही थी कि क्या आप मेरे लिए एक और चिट्ठी लिख देंगे?’

'अच्छा, मि. बोल्स को?’

'नहीं, इस बार उनकी तरफ से।‘

'क्या... क्याा मतलब?’

'ओह मैं भी बेवकूफ हूं। माफ करें, मेरी एक जान पहचान वाले हैं पुरुष मित्र। मेरी जैसी ही उनकी भी एक प्रेमिका है टेरेसा। क्या आप उस टेरेसा के लिए एक चिट्ठी लिख देंगे?’

मैंने देखा, वह तनाव में थी, उसकी अंगुलियां कांप रही थीं।... पहले तो मैं चकरा गया था, फिर मामला मेरी कुछ समझ में आया।

मैंने कहा, 'देखिए मोहतरमा, न तो कोई बोल्स है और न ही टेरेसा। आप अब तक मुझसे झूठ पर झूठ बोलती जा रही हैं। छल किए जा रही हैं। क्याक आप मेरी जासूसी करने नहीं आ रही हैं? मुझे आपसे पहचान बढ़ाने में या आपकी जान-पहचान वालों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। समझीं आप?’

और अचानक वह बुरी तरह घबरा कर परेशान हो गई। वह कभी इस पांव पर तो कभी उस पांव पर खड़ी होकर अजीब ढंग से बड़बड़ाने लगी। लग रहा था जैसे वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन कह नहीं पा रही थी। मुझे लगा, मैंने उस पर सन्देह करके बहुत गलत किया है। यह तो शायद कोई और ही बात थी।

वह 'मि. स्टूडेन्ट’ कहकर अचानक अपना सिर हिलाती हुई पलटी और दरवाजे से बाहर निकल कर अपने कमरे में चली गई। मैं अपने कमरे में दिमाग में उमड़ रहे अप्रीतिकर भावों के साथ जड़वत रह गया। एक भयानक आवाज के साथ उसका दरवाजा बन्द होने की आवाज आई। मुझे काफी दुख हुआ और लगा कि मुझे उसके पास जाकर सारा मामला सुलझा लेना चाहिए। उसे जाकर बुलाना चाहिए और वो जो चाहती है, उसके लिए लिख देना चाहिए। मैं उसके कमरे में गया। वह घुटनों पर झुकी हाथों में सिर पकड़े बैठी थी। 'सुनिये’

अब देखिए मैं जब भी अपनी कहानी के इस बिंदु पर आता हूं तो हमेशा मेरी बहुत अजीब हालत हो जाती है और मैं बहुत मूर्खतापूर्ण महसूस करने लगता हूं। ‘मेरी बात सुनेंगी आप?’ मैंने कहा।

वह उठी, आंखें चमकाती हुईं मुझ तक आई और मेरे कंधों पर हाथ टिकाते हुए अपनी खरखरी आवाज में फुसफुसाती हुई बोली, 'देखिये, बात यह है कि न तो सच में कोई बोल्स है और न ही टेरेसा। लेकिन इससे आपको क्या ? आपको तो एक कागज पर कुछ लिखने में ही तकलीफ होती है। कोई बोल्स नहीं और न ही टेरेसा, सिर्फ मैं हूं। और आपके पास ये जो दोनों हैं, इनसे आप जो कुछ अच्छा, चाहें, कर सकते हैं।‘

'माफ कीजिए।‘ मैंने कहा, 'यह सब क्या है? आप कहती हैं कोई बोल्स नहीं है?’

'हां।‘

'और कोई टेरेसा भी नहीं?’

'हां, कोई और टैरेसा नही, बस मैं ही टेरेसा हूं।‘

मैं कुछ भी नहीं समझ पाया। मैंने अपनी निगाहें उस पर टिका दीं और सोचने लगा कि दोनों में से पहले कौन आगे बढ़कर कोई हरकत करता है। लेकिन वही पहले मेज तक गई, कुछ तलाश किया और मेरे पास आकर शिकायती मुद्रा में उलाहने के साथ कहने लगी 'अगर आपको बोल्स के नाम चिट्ठी लिखने में तकलीफ हुई तो यह रहा आपका लिखा कागज। दूसरे लोग लिख देंगे मेरे लिए।‘

मैंने देखा उसके हाथ में बोल्सक के नाम मेरे हाथों लिखा हुआ पत्र था। ओफ्फो...।

'सुनिए मैडम, आखिर इस सबका क्या मतलब है? आप क्यों दूसरों के पास पत्र लिखवाने के लिए जायेंगी? यह तो पहले ही लिखा हुआ है और आपने इसे अभी तक भेजा भी नहीं?’

'कहां भेजती?’

'क्यों? मि. बोल्स को।‘

‘ऐसा कोई शख्स है ही नहीं।‘

मैं कुछ नहीं समझ पाया। फिर उसने बताना शुरू किया।

'बात यह है कि ऐसा कोई इंसान है ही नहीं।‘ और फिर उसने अपने हाथ कुछ इस तरह फैलाते हुए कहा, जैसे उसे खुद ही यकीन नहीं कि ऐसा कोई इन्सासन है ही नहीं।

‘लेकिन मैं चाहती हूं कि वो हो।... क्या मैं औरों की तरह इंसान नहीं हूं? हां, हां, मैं अच्छीउ तरह जानती हूं कि वह नहीं है कहीं भी... लेकिन किसी को भी ऐसे शख्सच को चिट्ठी लिखने में क्या और क्योंक तकलीफ होती है?’

'माफ कीजिए- किसे?’

'मि. बोल्स को और किसे?’

'लेकिन वह तो है ही नहीं- उसका कोई अस्तित्व नहीं।‘

'हे भगवान, क्या फर्क पड़ता है अगर वह नहीं है। उसका कोई अस्तित्व नहीं, लेकिन हो तो सकता है। मैं उसे लिखती हूं और इससे लगता है कि वो है और टेरेसा, जो मैं हूं, उसे वह जवाब देता है और मैं फिर उसे लिखती हूं।‘

और आखिरकार मेरी कुछ समझ में आया। मेरे पास एक ऐसी इंसानी शख्सियत खड़ी थी, जिसे दुनिया में प्यार करने वाला कोई नहीं था और जिसने ख़ुद अपने लिए एक दोस्त ईजाद कर लिया था।

'देखिए, आपने बोल्स के नाम एक चिट्ठी लिखी। मैं इसे किसी के पास ले जाती और वह इसे पढ़कर सुनाता तो मुझे लगता कि बोल्स है। और मैंने आपसे टेरेसा के नाम पत्र लिखने के लिए कहा था, उसे लेकर मैं किसी के पास जाती और उसे सुनते हुए मुझे विश्वास हो जाता कि बोल्स जरुर है और जिन्दगी मेरे लिए थोड़ी सहज-सरल हो जाती।‘

‘हे ईश्वमर, मुझे अपनी शरण में ले लो।‘ उसकी बातें सुनकर मैंने अपने आप से ही कहा।

उस दिन के बाद से मैं नियमित रुप से सप्ता ह में दो बार उसके लिए चिट्ठियां लिखने लगा। बोल्स के नाम और बोल्स की तरफ से टेरेसा को। वह उन्हें सुनती और रोने लग जाती। काल्पनिक बोल्स के वास्तविक पत्रों से आंसुओं में डूब कर उसने मेरे कपड़ों की मरम्मत का जिम्मा ले लिया। लगभग तीन महीने के इस सिलसिले के बाद उन्होंने उसे जेल भेज दिया। अब तो वह निश्चित तौर पर मर चुकी होगी।

इतना कहकर मेरे परिचित ने सिगरेट की राख़ झाड़ते हुए अपनी बात समाप्तह करते हुए कहा।

बहरहाल, इंसान जितनी कड़वी चीजें चख लेता है, जीवन में उसे मीठी चीजें चखने के बाद उनकी उतनी ही भूख बढ़ती जाती है। और हम अपनी नियति में लिपटे हुए लोग इस बात को कभी नहीं समझ सकते।

और फिर तमाम चीजें बेहद मूर्खतापूर्ण और क्रूर नज़र आने लगती हैं। जिन्हेंत हम वंचित वर्ग कहते हैं, वे कौन हैं आखिर... मैं जानना चाहता हूं। वे हैं हमारे जैसे ही एक ही मांस, मज्जा और रक्तर से बने लोग... यह बात हमें युगों से बताई जा रही है। और हम इसे सच में बस सुनते आए हैं... और सिर्फ शैतान ही जानता है कि यह कितना घिनौना सच है?... क्याऔ हम मानवतावाद के प्रवचनों से पूरी तरह दूर भाग चले हैं?... लेकिन वास्तनविकता में हम सब भी बेहद गिरे हुए और पतित लोग हैं। और जितना मैं समझ पाया हूं उसके अनुसार हम आत्महकेंद्रीयता और अपनी ही श्रेष्ठैता के भावबोध के रसातल में पहुंच चुके हैं। लेकिन बहुत हो चुका यह सब... यह सब पर्वतों जितना ही पुराना है और इतना पुराना कि अब तो इसके बारे में बात करने पर भी शर्म महसूस होती है। बहुत-बहुत पुरानी बीमारी है यह सच में...

अनुवाद : प्रेमचन्द गांधी

 

 

करोड़पति कैसे होते हैं
(The Billionaire)

संयुक्त राज्य अमेरिका के इस्पात और तेल के सम्राटों और बाकी सम्राटों ने मेरी कल्पना को हमेशा तंग किया है। मैं कल्पना ही नहीं कर सकता कि इतने सारे पैसेवाले लोग सामान्य नश्वर मनुष्य हो सकते हैं।

मुझे हमेशा लगता रहा है कि उनमें से हर किसी के पास कम से कम तीन पेट और डेढ़ सौ दाँत होते होंगे। मुझे यकीन था कि हर करोड़पति सुबह छः बजे से आधी रात तक खाना खाता रहता होगा। यह भी कि वह सबसे महँगे भोजन भकोसता होगा: बत्तखें, टर्की, नन्हे सूअर, मक्खन के साथ गाजर, मिठाइयाँ, केक और तमाम तरह के लज़ीज़ व्यंजन। शाम तक उसके जबड़े इतना थक जाते होंगे कि वह अपने नीग्रो नौकरों को आदेश देता होगा कि वे उसके लिए खाना चबाएँ ताकि वह आसानी से उसे निगल सके। आखिरकार जब वह बुरी तरह थक चुकता होगा, पसीने से नहाया हुआ, उसके नौकर उसे बिस्तर तक लाद कर ले जाते होंगे। और अगली सुबह वह छः बजे जागता होगा अपनी श्रमसाध्य दिनचर्या को दुबारा शुरू करने को।

लेकिन इतनी ज़बरदस्त मेहनत के बावजूद वह अपनी दौलत पर मिलने वाले ब्याज का आधा भी खर्च नहीं कर पाता होगा।

निश्चित ही यह एक मुश्किल जीवन होता होगा। लेकिन किया भी क्या जा सकता होगा? करोड़पति होने का फ़ायदा ही क्या अगर आप और लोगों से ज़्यादा खाना न खा सकें?

मुझे लगता था कि उसके अन्तर्वस्त्र बेहतरीन कशीदाकारी से बने होते होंगे। उसके जूतों के तलुवों पर सोने की कीलें ठुकी होती होंगी और हैट की जगह वह हीरों से बनी कोई टोपी पहनता होगा। उसकी जैकेट सबसे महँगी मखमल की बनी होती होगी। वह कम से कम पचास मीटर लम्बी होती होगी और उस पर सोने के कम से कम तीन सौ बटन लगे होते होंगे। छुट्टियों में वह एक के ऊपर एक आठ जैकेटें और छः पतलूनें पहनता होगा। यह सच है कि ऐसा करना अटपटा होने के साथ साथ असुविधापूर्ण भी होता होगा… लेकिन एक करोड़पति जो इतना रईस हो बाकी लोगों जैसे कपड़े कैसे पहन सकता है…

करोड़पति की जेबें एक विशाल गड्ढे जैसी होती होंगी जिनमें वह समूचा चर्च, संसद की इमारत और अन्य छोटी-मोटी ज़रूरतों को रख सकता होगा। लेकिन जहाँ एक तरफ मैं सोचता था कि इन महाशय के पेट की क्षमता किसी बड़े समुद्री जहाज़ के गोदाम जितनी होती होगी मुझे इन साहब की टाँगों पर फिट आने वाली पतलून के आकार की कल्पना करने में थोड़ी हैरानी हुई। अलबत्ता मुझे यकीन था कि वह एक वर्ग मील से कम आकार की रज़ाई के नीचे नहीं सोता होगा। और अगर वह तम्बाकू चबाता होगा तो सबसे नफीस किस्म का और एक बार में एक या दो पाउण्ड से कम नहीं। अगर वह नसवार सूँघता होगा तो एक बार में एक पाउण्ड से कम नहीं। पैसा अपनेआप को खर्च करना चाहता है…

उसकी उँगलियाँ अद्भुत तरीके से संवेदनशील होती होंगी और उनमें अपनी इच्छानुसार लम्बा हो जाने की जादुई ताकत होती होगी: मिसाल के तौर पर वह साइबेरिया में अंकुरित हो रहे एक डॉलर पर न्यूयार्क से निगाह रख सकता था और अपनी सीट से हिले बिना वह बेरिंग स्टेट तक अपना हाथ बढ़ाकर अपना पसन्दीदा फूल तोड़ सकता था।

अटपटी बात यह है कि इस सब के बावजूद मैं इस बात की कल्पना नहीं कर पाया कि इस दैत्य का सिर कैसा होता होगा। मुझे लगा कि वह सिर मांसपेशियों और हड्डियों का ऐसा पिण्ड होता होगा जिसे फ़कत हर एक चीज़ से सोना चूस लेने की इच्छा से प्रेरणा मिलती होगी। लब्बोलुआब यह कि करोड़पति की मेरी छवि एक हद तक अस्पष्ट थी। संक्षेप में कहूँ तो सबसे पहले मुझे दो लम्बी लचीली बाँहें नजर आती थीं। उन्होंने ग्लोब को अपनी लपेट में ले रखा था और उसे अपने मुँह की भूखी गुफा के पास खींच रखा था जो हमारी धरती को चूसता-चबाता जा रहा था: उसकी लालचभरी लार उसके ऊपर टपक रही थी जैसे वह तन्दूर में सिंका कोई स्वादिष्ट आलू हो।

आप मेरे आश्चर्य की कल्पना कर सकते हैं जब एक करोड़पति से मिलने पर मैंने उसे एक निहायत साधारण आदमी पाया।

एक गहरी आरामकुर्सी पर मेरे सामने एक बूढ़ा सिकुड़ा-सा शख्स बैठा हुआ था जिसके झुरीर्दार भूरे हाथ शान्तिपूर्वक उसकी तोंद पर धरे हुए थे। उसके थुलथुल गालों पर करीने से हज़ामत बनायी गयी थी और उसका ढुलका हुआ निचला होंठ बढ़िया बनी हुई उसकी बत्तीसी दिखला रहा था जिसमें कुछेक दांत सोने के थे। उसका रक्तहीन और पतला ऊपरी होंठ उसके दाँतों से चिपका हुआ था और जब वह बोलता था उस ऊपरी होंठ में ज़रा भी गति नहीं होती थी। उसकी बेरंग आँखों के ऊपर भौंहें बिल्कुल नहीं थीं और सूरज में तपे हुए उसके सिर पर एक भी बाल नहीं था। उसे देखकर महसूस होता था कि उसके चेहरे पर थोड़ी और त्वचा होती तो शायद बेहतर होता या लाली लिए हुए वह गतिहीन और मुलायम चेहरा किसी नवजात शिशु के जैसा लगता था। यह तय कर पाना मुश्किल था कि यह प्राणी दुनिया में अभी अभी आया है या यहाँ से जाने की तैयारी में है…

उसकी पोशाक भी किसी साधारण आदमी की ही जैसी थी। उसके बदन पर सोना घड़ी, अँगूठी और दाँतों तक सीमित था। कुल मिलाकर शायद वह आधे पाउण्ड से कम था। आम तौर पर वह यूरोप के किसी कुलीन घर के पुराने नौकर जैसा नज़र आ रहा था…

जिस कमरे में वह मुझसे मिला उसमें सुविधा या सुन्दरता के लिहाज़ से कुछ भी उल्लेखनीय नहीं था। फर्नीचर विशालकाय था पर बस इतना ही था।

उसके फर्नीचर को देखकर लगता था कि कभी-कभी हाथी उसके घर तशरीफ लाया करते थे।

“क्या आप… आप… ही करोड़पति हैं?” अपनी आँखों पर अविश्वास करते हुए मैंने पूछा।

“हाँ, हाँ!” उसने सिर हिलाते हुए जवाब दिया।

मैंने उसकी बात पर विश्वास करने का नाटक किया और फैसला किया कि उसकी गप्प का उसी वक्त इम्तहान ले लूँ।

“आप नाश्ते में कितना गोश्त खा सकते हैं?” मैंने पूछा।

“मैं गोश्त नहीं खाता,” उसने घोषणा की, “बस सन्तरे की एक फाँक, एक अण्डा और चाय का छोटा प्याला…”

बच्चों जैसी उसकी आँखों में धुँधलाए पानी की दो बड़ी बूँदों जैसी चमक आयी और मैं उनमें झूठ का नामोनिशान नहीं देख पा रहा था।

“चलिए ठीक है,” मैंने संशयपूर्वक बोलना शुरू किया। “मैं आपसे विनती करता हूँ कि मुझे ईमानदारी से बताइए कि आप दिन में कितनी बार खाना खाते हैं?”

“दिन में दो बार,” उसने ठण्डे स्वर में कहा। “नाश्ता और रात का खाना। मेरे लिए पर्याप्त होता है। रात को खाने में मैं थोड़ा सूप, थोड़ा चिकन और कुछ मीठा लेता हूँ। कोई फल। एक कप कॉफी। एक सिगार…”

मेरा आश्चर्य कद्दू की तरह बढ़ रहा था। उसने मुझे सन्तों की-सी निगाह से देखा। मैं साँस लेने को ठहरा और फिर पूछना शुरू कियाः

“लेकिन अगर यह सच है तो आप अपने पैसे का क्या करते हैं?”

उसने अपने कन्धों को ज़रा उचकाया और उसकी आँखें अपने गड्ढों में कुछ देर लुढ़कीं और उसने जवाब दियाः

“मैं उसका इस्तेमाल और पैसा बनाने में करता हूँ…”

“किस लिए?”

“ताकि मैं और अधिक पैसा बना सकूँ…”

“लेकिन किसलिए?” मैंने हठपूर्वक पूछा।

वह आगे की तरफ झुका और अपनी कोहनियों को कुर्सी के हत्थे पर टिकाते हुए तनिक उत्सुकता से पूछाः

“क्या आप पागल हैं?”

“क्या आप पागल हैं?” मैंने पलटकर जवाब दिया।

बूढ़े ने अपना सिर झुकाया और सोने के दाँतों के बीच से धीरे-धीरे बोलना शुरू कियाः

“तुम बड़े दिलचस्प आदमी हो… मुझे याद नहीं पड़ता मैं कभी तुम्हारे जैसे आदमी से मिला हूँ…”

उसने अपना सिर उठाया और अपने मुँह को करीब-करीब कानों तक फैलाकर ख़ामोशी के साथ मेरा मुआयना करना शुरू किया। उसके शान्त व्यवहार को देख कर लगता था कि स्पष्टतः वह अपनेआप को सामान्य आदमी समझता था। मैंने उसकी टाई पर लगी एक पिन पर जड़े छोटे-से हीरे को देखा। अगर वह हीरा जूते की एड़ी जितना बड़ा होता तो मैं शायद जान सकता था कि मैं कहाँ बैठा हूँ।

“और अपने खुद के साथ आप क्या करते हैं?”

“मैं पैसा बनाता हूँ।” अपने कन्धों को तनिक फैलाते हुए उसने जवाब दिया।

“यानी आप नकली नोटों का धन्धा करते हैं” मैं ख़ुश होकर बोला मानो मैं रहस्य पर से परदा उठाने ही वाला हूँ। लेकिन इस मौके पर उसे हिचकियाँ आनी शुरू हो गयीं। उसकी सारी देह हिलने लगी जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे गुदगुदी कर रहा हो। वह अपनी आँखों को तेज़-तेज़ झपकाने लगा।

“यह तो मसखरापन है,” ठण्डा पड़ते हुए उसने कहा और मेरी तरफ एक सन्तुष्ट निगाह डाली। “मेहरबानी कर के मुझसे कोई और बात पूछिए,” उसने निमंत्रित करते हुए कहा और किसी वजह से अपने गालों को जरा सा फुलाया। मैंने एक पल को सोचा और निश्चित आवाज़़ में पूछाः

“और आप पैसा कैसे बनाते हैं?”

“अरे हाँ! ये ठीकठाक बात हुई!” उसने सहमति में सिर हिलाया। “बड़ी साधारण-सी बात है। मैं रेलवे का मालिक हूँ। किसान माल पैदा करते हैं। मैं उनका माल बाजार में पहुँचाता हूँ। आपको बस इस बात का हिसाब लगाना होता है कि आप किसान के वास्ते बस इतना पैसा छोड़ें कि वह भूख से न मर जाये और आपके लिए काम करता रहे। बाकी का पैसा मैं किराये के तौर पर अपनी जेब में डाल लेता हूँ। बस इतनी-सी बात है।”

“और क्या किसान इससे सन्तुष्ट रहते हैं?”

“मेरे ख्याल से सारे नहीं रहते!” बालसुलभ साधारणता के साथ वह बोला “लेकिन वो कहते हैं ना, लोग कभी सन्तुष्ट नहीं होते। ऐसे पागल लोग आपको हर जगह मिल जायेंगे जो बस शिकायत करते रहते हैं…”

“तो क्या सरकार आपसे कुछ नहीं कहती?” आत्मविश्वास की कमी के बावजूद मैंने पूछा।

“सरकार?” उसकी आवाज़ थोड़ा गूँजी फिर उसने कुछ सोचते हुए अपने माथे पर उँगलियाँ फिरायीं। फिर उसने अपना सिर हिलाया जैसे उसे कुछ याद आया होः “अच्छा… तुम्हारा मतलब है वो लोग… जो वाशिंगटन में बैठते हैं? ना वो मुझे तंग नहीं करते। वो अच्छे बन्दे हैं… उनमें से कुछ मेरे क्लब के सदस्य भी हैं। लेकिन उनसे बहुत ज़्यादा मुलाकात नहीं होती… इसी वजह से कभी-कभी मैं उनके बारे में भूल जाता हूँ। ना वो मुझे तंग नहीं करते।” उसने अपनी बात दोहरायी और मेरी तरफ उत्सुकता से देखते हुए पूछाः

“क्या आप कहना चाह रहे हैं कि ऐसी सरकारें भी होती हैं जो लोगों को पैसा बनाने से रोकती हैं?”

मुझे अपनी मासूमियत और उसकी बुद्धिमत्ता पर कोफ्त हुई।

“नहीं,” मैंने धीमे से कहा “मेरा ये मतलब नहीं था… देखिए सरकार को कभी-कभी तो सीधी-सीधी डकैती पर लगाम लगानी चाहिए ना…”

“अब देखिए!” उसने आपत्ति की। “ये तो आदर्शवाद हो गया। यहाँ यह सब नहीं चलता। व्यक्तिगत कार्यों में दखल देने का सरकार को कोई हक नहीं…”

उसकी बच्चों जैसी बुद्धिमत्ता के सामने मैं खुद को बहुत छोटा पा रहा था।

“लेकिन अगर एक आदमी कई लोगों को बर्बाद कर रहा हो तो क्या वह व्यक्तिगत काम माना जायेगा?” मैंने विनम्रता के साथ पूछा।

“बबार्दी?” आँखें फैलाते हुए उसने जवाब देना शुरू किया। “बर्बादी का मतलब होता है जब मज़दूरी की दरें ऊँची होने लगें। या जब हड़ताल हो जाये। लेकिन हमारे पास आप्रवासी लोग हैं। वो ख़ुशी-ख़ुशी कम मज़दूरी पर हड़तालियों की जगह काम करना शुरू कर देते हैं। जब हमारे मुल्क में बहुत सारे ऐसे आप्रवासी हो जायेंगे जो कम पैसे पर काम करें और ख़ूब सारी चीजें ख़रीदें तब सब कुछ ठीक हो जायेगा।”

वह थोड़ा-सा उत्तेजित हो गया था और एक बच्चे और बूढ़े के मिश्रण से कुछ कम नज़र आने लगा था। उसकी पतली भूरी उँगलियाँ हिलीं और उसकी रूखी आवाज़ मेरे कानों पर पड़पड़ाने लगीः

“सरकार? ये वास्तव में दिलचस्प सवाल है। एक अच्छी सरकार का होना महत्वपूर्ण है। उसे इस बात का ख़्याल रहता है कि इस देश में उतने लोग हों जितनों की मुझे ज़रूरत है और जो उतना ख़रीद सकें जितना मैं बेचना चाहता हूँ; और मज़दूर बस उतने हों कि मेरा काम कभी न थमे। लेकिन उससे ज़्यादा नहीं! फिर कोई समाजवादी नहीं बचेंगे। और हड़तालें भी नहीं होंगी। और सरकार को बहुत ज़्यादा टैक्स भी नहीं लगाने चाहिए। लोग जो देना चाहें वह ले ले। इसको मैं कहता हूँ अच्छी सरकार।”

“वह बेवकूफ़ नहीं है। यह एक तयशुदा संकेत है कि उसे अपनी महानता का भान है।” मैं सोच रहा था। “इस आदमी को वाकई राजा ही होना चाहिए…”

“मैं चाहता हूँ,” वह स्थिर और विश्वासभरी आवाज़ में बोलता गया “कि इस मुल्क में अमन-चैन हो। सरकार ने तमाम दार्शनिकों को भाड़े पर रखा हुआ है जो हर इतवार को कम से कम आठ घण्टे लोगों को यह सिखाने में ख़र्च करते हैं कि क़ानून की इज़्ज़त की जानी चाहिए। और अगर दार्शनिकों से यह काम नहीं होता तो सरकार फौज बुला लेती है। तरीका नहीं बल्कि नतीजा ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है। ग्राहक और मज़दूर को कानून की इज़्ज़त करना सिखाया जाना चाहिए। बस!” अपनी उँगलियों से खेलते हुए उसने अपनी बात पूरी की।

… “और धर्म के बारे में आप का क्या ख्याल है?” अब मैंने प्रश्न किया जबकि वह अपना राजनीतिक दृष्टिकोण स्पष्ष्ट कर चुका था।

“अच्छा!” उसने उत्तेजना के साथ अपने घुटनों को थपथपाया और बरौनियों को झपकाते हुए कहा: “मैं इस बारे में भली बातें सोचता हूँ। लोगों के लिए धर्म बहुत ज़रूरी है। इस बात पर मेरा पूरा यकीन है। सच बताऊँ तो मैं ख़ुद इतवारों को चर्च में भाषण दिया करता हूँ… बिल्कुल सच कह रहा हूँ आपसे।”

“और आप क्या कहते हैं अपने भाषणों में?” मैंने सवाल किया।

“वही सब जो एक सच्चा ईसाई चर्च में कह सकता है!” उसने बहुत विश्वस्त होकर कहा। “देखिए मैं एक छोटे चर्च में भाषण देता हूँ और ग़रीब लोगों को हमेशा दयापूर्ण शब्दों और पितासदृश सलाह की ज़रूरत होती है… मैं उनसे कहता हूँ…”

“ईसामसीह के बन्दो! ईर्ष्या के दैत्य के लालच से खुद को बचाओ और दुनियादारी से भरी चीज़ों को त्याग दो। इस धरती पर जीवन संक्षिप्त होता है: बस चालीस की आयु तक आदमी अच्छा मज़दूर बना रह सकता है। चालीस के बाद उसे फैक्ट्रियों में रोज़गार नहीं मिल सकता। जीवन कतई सुरक्षित नहीं है। काम के वक्त आपके हाथों की एक गलत हरकत और मशीन आपकी हड्डियों को कुचल सकती है। लू लग गयी और आपकी कहानी खत्म हो सकती है। हर कदम पर बीमारी और दुर्भाग्य कुत्ते की तरह आपका पीछा करते रहते हैं। एक ग़रीब आदमी किसी ऊँची इमारत की छत पर खड़े अन्धे आदमी जैसा होता है। वह जिस दिशा में जायेगा अपने विनाश में जा गिरेगा जैसा जूड के भाई फरिश्ते जेम्स ने हमें बताया है। भाइयो, आप को दुनियावी चीज़ों से बचना चाहिए। वह मनुष्य को तबाह करने वाले शैतान का कारनामा है। ईसामसीह के प्यारे बच्चो, तुम्हारा साम्राज्य तुम्हारे परमपिता के साम्राज्य जैसा है। वह स्वर्ग में है। और अगर तुम में धैर्य होगा और तुम अपने जीवन को बिना शिकायत किये, बिना हल्ला किये बिताओगे तो वह तुम्हें अपने पास बुलायेगा और इस धरती पर तुम्हारी कड़ी मेहनत के परिणाम के बदले तुम्हें ईनाम में स्थाई शान्ति बख़्शेगा। यह जीवन तुम्हारी आत्मा की शुद्धि के लिए दिया गया है और जितना तुम इस जीवन में सहोगे उतना ज़्यादा आनन्द तुम्हें मिलेगा जैसा कि ख़ुद फरिश्ते जूड ने बताया है।”

उसने छत की तरफ इशारा किया और कुछ देर सोचने के बाद ठण्डी और कठोर आवाज़ में कहाः

“हाँ, मेरे प्यारे भाइयो और बहनो, अगर आप अपने पड़ोसी के लिए चाहे वह कोई भी हो, इसे कुर्बान नहीं करते तो यह जीवन खोखला और बिल्कुल साधारण है। ईर्ष्या के राक्षस के सामने अपने दिलों को समर्पित मत करो। किस चीज से ईर्ष्या करोगे? जीवन के आनन्द बस धोखा होते हैं; राक्षस के खिलौने। हम सब मारे जायेंगे। अमीर और ग़रीब, राजा और कोयले की खान में काम करने वाले मज़दूर, बैंकर और सड़क पर झाड़ू लगाने वाले। यह भी हो सकता है कि स्वर्ग के उपवन में आप राजा बन जायें और राजा झाड़ू लेकर रास्ते से पत्तियाँ साफ कर रहा हो और आपकी खायी हुई मिठाइयों के छिलके बुहार रहा हो। भाइयो, यहाँ इस धरती पर इच्छा करने को है ही क्या? पाप से भरे इस घने जंगल में जहाँ आत्मा बच्चों की तरह पाप करती रहती है। प्यार और विनम्रता का रास्ता चुनो और जो तुम्हारे नसीब में आता है उसे सहन करो। अपने साथियों को प्यार दो, उन्हें भी जो तुम्हारा अपमान करते हैं…”

उसने फिर से आँखें बन्द कर लीं और अपनी कुर्सी पर आराम से हिलते हुए बोलना जारी रखाः

“ईर्ष्या की उन पापी भावनाओं और लोगों की बात पर ज़रा भी कान न दो जो तुम्हारे सामने किसी की ग़रीबी और किसी दूसरे की सम्पन्नता का विरोधाभास दिखाती हैं। ऐसे लोग शैतान के कारिन्दे होते हैं। अपने पड़ोसी से ईर्ष्या करने से भगवान ने तुम्हें मना किया हुआ है। अमीर लोग भी निर्धन होते हैं: प्रेम के मामले में। ईसामसीह के भाई जूड ने कहा था अमीरों से प्यार करो क्योंकि वे ईश्वर के चहेते हैं। समानता की कहानियों और शैतान की बाकी बातों पर जरा भी ध्यान मत दो। इस धरती पर क्या होती है समानता? आपको अपने ईश्वर के सम्मुख एक-दूसरे के साथ अपनी आत्मा की शुद्धता की बराबरी करनी चाहिए। धैर्य के साथ अपनी सलीब धारण करो और आज्ञापालन करने से तुम्हारा बोझ हल्का हो जायेगा। ईश्वर तुम्हारे साथ है मेरे बच्चो और तुम्हें उसके अलावा किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है!”

बूढ़ा चुप हुआ और उसने अपने होंठों को फैलाया। उसके सोने के दाँत चमके और वह विजयी मुद्रा में मुझे देखने लगा। “आपने धर्म का बढ़िया इस्तेमाल किया,” मैंने कहा। “हाँ बिल्कुल ठीक! मुझे उसकी कीमत पता है।” वह बोला, “मैं अपनी बात दोहराता हूँ कि गरीबों के लिए धर्म बहुत ज़रूरी है। मुझे अच्छा लगता है यह। यह कहता है कि इस धरती पर सारी चीजें शैतान की हैं। और ऐ इन्सान, अगर तू अपनी आत्मा को बचाना चाहता है तो यहाँ धरती पर किसी भी चीज़ को छूने तक की इच्छा मत कर। जीवन के सारे आनन्द तुझे मौत के बाद मिलेंगे। स्वर्ग की हर चीज़ तेरी है। जब लोग इस बात पर विश्वास करते हैं तो उन्हें सम्हालना आसान हो जाता है। हाँ, धर्म एक चिकनाई की तरह होता है। और जीवन की मशीन को हम इससे चिकना बनाते रहें तो सारे पुर्जे ठीकठाक काम करते रहते हैं और मशीन चलाने वाले के लिए आसानी होती है…”

“यह आदमी वाकई में राजा है,” मैंने फैसला किया।

… “शायद आप विज्ञान के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?” मैंने शान्ति से सवाल किया।

“विज्ञान?” उसने अपनी एक उँगली छत की तरफ उठायी। फिर उसने अपनी घड़ी बाहर निकाली, समय देखा और उसकी चेन को अपनी उँगली पर लपेटते हुए उसे हवा में उछाल दिया। फिर उसने एक आह भरी और कहना शुरू किया:

“विज्ञान… हाँ मुझे मालूम है। किताबें। अगर वे अमेरिका के बारे में अच्छी बातें करती हैं तो वे उपयोगी हैं। मेरा विचार है कि ये कवि लोग जो किताबें-विताबें लिखते हैं बहुत कम पैसा बना पाते हैं। ऐसे देश में जहाँ हर कोई अपने धन्धे में लगा हुआ है किताबें पढ़ने का समय किसी के पास नहीं है…। हाँ और ये कवि लोग ग़ुस्से में आ जाते हैं कि कोई उनकी किताबें नहीं खरीदता। सरकार को लेखकों को ठीकठाक पैसा देना चाहिए। बढ़िया खाया-पिया आदमी हमेशा ख़ुश और दयालु होता है। अगर अमेरिका के बारे में किताबें वाकई ज़रूरी हैं तो अच्छे कवियों को भाड़े पर लगाया जाना चाहिए और अमरीका की ज़रूरत की किताबें बनायी जानी चाहिए… और क्या।”

“विज्ञान की आपकी परिभाषा बहुत संकीर्ण है।” मैंने विचार करते हुए कहा।

उसने आँखें बन्द कीं और विचारों में खो गया। फिर आँखें खोलकर उसने आत्मविश्वास के साथ बोलना शुरू किया:

“हाँ, हाँ… अध्यापक और दार्शनिक… वह भी विज्ञान होता है। मैं जानता हूँ प्रोफेसर, दाइयाँ, दाँतों के डाक्टर, ये सब। वकील, डाक्टर, इंजीनियर। ठीक है, ठीक है। वो सब ज़रूरी हैं। अच्छे विज्ञान को ख़राब बातें नहीं सिखानी चाहिए। लेकिन मेरी बेटी के अध्यापक ने एक बार मुझे बताया था कि सामाजिक विज्ञान भी कोई चीज़ है…। ये बात मेरी समझ में नहीं आयी…। मेरे ख्याल से ये नुकसानदेह चीजें हैं। एक समाजशास्त्री अच्छे विज्ञान की रचना नहीं कर सकता। उनका विज्ञान से कुछ लेना-देना नहीं होता। एडीसन बना रहा है ऐसा विज्ञान जो उपयोगी है। फोनोगाफ और सिनेमा – वह उपयोगी है। लेकिन विज्ञान की इतनी सारी किताबें? ये तो हद है। लोगों को उन किताबों को नहीं पढ़ना चाहिए जिनसे उनके दिमागों में सन्देह पैदा होने लगें। इस धरती पर सब कुछ वैसा ही है जैसा होना चाहिए और उस सबको किताबों के साथ नहीं गड़बड़ाया जाना चाहिए।”

मैं खड़ा हो गया।

“अच्छा तो आप जा रहे हैं?”

“हाँ,” मैंने कहा “लेकिन शायद चूँकि अब मैं जा रहा हूँ क्या आप मुझे बता सकते हैं करोड़पति होने का मतलब क्या है?”

उसे हिचकियाँ आने लगीं और वह अपने पैर पटकने लगा। शायद यह उसके हँसने का तरीका था।

“यह एक आदत होती है,” जब उसकी साँस आयी तो वह ज़ोर से बोला।

“आदत क्या होती है?” मैंने सवाल किया।

“करोड़पति होना… एक आदत होती है भाई!”

कुछ देर सोचने के बाद मैंने अपना आखिरी सवाल पूछाः

“तो आप समझते हैं कि सारे आवारा, नशेड़ी और करोड़पति एक ही तरह के लोग होते हैं?”

इस बात से उसे चोट पहुँची होगी। उसकी आँखें बड़ी हुईं और गुस्से ने उन्हें हरा बना दिया।

“मेरे ख़्याल से तुम्हारी परवरिश ठीकठाक नहीं हुई है।” उसने ग़ुस्से में कहा।

“अलविदा,” मैंने कहा।

वह विनम्रता के साथ मुझे पोर्च तक छोड़ने आया और सीढ़ियों के ऊपर अपने जूतों को देखता खड़ा रहा। उसके घर के आगे एक लॉन था जिस पर बढ़िया छँटी हुई घनी घास थी। मैं यह विचार करता हुआ लॉन पर चल रहा था कि शुक्र है मुझे इस आदमी से फिर कभी नहीं मिलना पड़ेगा। तभी मुझे पीछे से आवाज़ सुनायी दी:

“सुनिए!”

मैं पलटा। वह वहीं खड़ा था और मुझे देख रहा था।

“क्या यूरोप में आपके पास ज़रूरत से ज़्यादा राजा हैं?” उसने धीरे-धीरे पूछा।

“अगर आप मेरी राय जानना चाहते हैं तो हमें उनमें से एक की भी ज़रूरत नहीं है।” मैंने जवाब दिया।

वह एक तरफ को गया और उसने वहीं थूक दिया।

“मैं अपने लिए दो-एक राजाओं को किराये पर रखने की सोच रहा हूँ,” वह बोला। “आप क्या सोचते हैं?”

“लेकिन किसलिए?”

“बड़ा मज़ेदार रहेगा। मैं उन्हें आदेश दूँगा कि वे यहाँ पर मुक्केबाज़ी करके दिखाएँ…”

उसने लॉन की तरफ इशारा किया और पूछताछ के लहजे में बोला:

“हर रोज एक से डेढ़ बजे तक। कैसा रहेगा? दोपहर के खाने के बाद कुछ देर कला के साथ समय बिताना अच्छा रहेगा… बहुत ही बढ़िया।”

वह ईमानदारी से बोल रहा था और मुझे लगा कि अपनी इच्छा पूरी करने के लिए वह कुछ भी कर सकता है।

“लेकिन इस काम के लिए राजा ही क्यों?”

“क्योंकि आज तक किसी ने इस बारे में नहीं सोचा” उसने समझाया।

“लेकिन राजाओं को तो खुद दूसरों को आदेश देने की आदत पड़ी होती है” इतना कहकर मैं चल दिया।

“सुनिए तो,” उसने मुझे फिर से पुकारा।

मैं फिर से ठहरा। अपनी जेबों में हाथ डाले वह अब भी वहीं खड़ा था। उसके चेहरे पर किसी स्वप्न का भाव था।

उसने अपने होंठों को हिलाया जैसे कुछ चबा रहा हो और धीमे से बोला:

“तीन महीने के लिए दो राजाओं को एक से डेढ़ बजे तक मुक्केबाज़ी करवाने में कितना खर्च आयेगा आपके विचार से?”

 

 

 

एक पाठक
(A Reader)

रात काफी हो गयी थी जब मैं उस घर से विदा हुआ जहाँ मित्रों की एक गोष्ठी में अपनी प्रकाशित कहानियों में से एक का मैंने अभी पाठ किया था। उन्होंने तारीफ के पुल बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और मैं धीरे-धीरे मगन भाव से सड़क पर चल रहा था, मेरा हृदय आनंद से छलक रहा था और जीवन के एक ऐसा सुख का अनुभव मैं कर रहा था जैसा पहले कभी नहीं किया था।

फरवरी का महीना था, रात साफ थी और खूब तारों से जड़ा मेघरहित आकाश धरती पर स्फूर्तिदायक शीतलता का संचार कर रहा था, जो नई गिरी बर्फ से सोलहों सिंगार किये हुए थी। 'इस धरती पर लोगों की नजरों में कुछ होना अच्छा लगता है!' मैंने सोचा और मेरे भविष्य के चित्र में उजले रंग भरने में मेरी कल्पना ने कोई कोताही नहीं की।

"हां, तुमने एक बहुत ही प्यारी-सी चीज लिखी है, इसमें कोई शक नहीं," मेरे पीछे सहसा कोई गुनगुना उठा, मैं अचरज से चौंका और घूमकर देखने लगा, काले कपड़े पहने एक छोटे कद का आदमी आगे बढ़कर निकट आ गया और पैनी लघु मुस्कान के साथ मेरे चेहरे पर उसने अपनी आंखें जमा दीं, उसकी हर चीज पैनी मालूम होती थी-उसकी नजर, उसके गालों की हड्डियां, उसकी दाढ़ी जो बकरे की दाढ़ी की तरह नोकदार थी, उसका समुचा छोटा और मूरझाया-सा ढांचा, जो कुछ इतना विचित्र नोक-नुकीलापन लिये था कि आंखों में चुभता था, उसकी चाल हल्की और निःशब्द थी, ऐसा मालूम होता था जैसे वह बर्फ पर फिसल रहा हो, गोष्ठी में जो लोग मौजूद थे, उनमें वह मुझे नजर नहीं आया था ओर इसीलिए उसकी टिप्पणी ने मुझे चकित कर दिया था, वह कौन था? और कहां से आया था?

"क्या आपने...मतलव ...मेरी कहानी सुनी थी? मैंने पूछा

"हां, मुझे उसे सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।"

उसकी आवाज तेज थी, उसके पतले होंठ और छोटी काली मुछें थी जो उसकी मुस्कान को नहीं छिपा पाती थीं। मुस्कान उसके होंठो से विदा होने का नाम ही नहीं लेती थी और यह मुझे बड़ा अटपटा मालूम हो रहा था।

"अपने आपको अन्य सबसे अनोखा अनुभव करना बड़ा सुखद मालूम होता है, क्यों, ठीक है न?" मेरे साथी ने पूछा, मुझे इस प्रश्न में ऐसी कोई बात नहीं लगी जो असाधारण हो ,सो मुझे सहमति प्रकट करने में देर नहीं लगी।

"हो-हो-हो!" पतली उगलियों से अपने छोटे हाथों को मलते हुए वह तीखी हंसी हंसा, उसकी हंसी मुझे अपमानित करने वाली थी।

"तुम बड़े हंसमुख जीव मालूम होते हो," मैंने रूखी आवाज में कहा, "अरे हाँ, बहुत!" मुस्काराते और सिर हिलाते हुए उसने ताईद की, "साथ ही मैं बाल की खाल निकालने वाला भी हूं क्योंकि मैं हमेशा चीजों को जानना चाहता हूं-हर चीज को जानना चाहता हूं।"

वह फिर अपनी तीखी हंसी हँसा और वेध देने वाली अपनी काली आंखों से मेरी ओर देखता रहा, मैंने अपने कद की ऊंचाई से एक नज़र उस पर डाली और ठंडी आवाज में पूछा, "माफ करना लेकिन क्या मैं जान सकता हूँ कि मुझे किससे बातें करने का सौभाग्य ...."

"मैं कौन हूँ? क्या तुम अनुमान नहीं लगा सकते? जो हो, मैं फिलहाल तुम्हें आदमी का नाम उस बात से ज्यादा महत्वपूर्ण मालूम होता है जो कि वह कहने जा रहा है ?"

"निश्चय ही नहीं, लेकिन यह कुछ ... बहूत ही अजीब है," मैंने जवाब दिया ।

उसने मेरी आस्तीन पकड़ कर उसे एक हल्का-सा झटका दिया और शांत हँसी के साथ कहा, "होने दो अजीब, आदमी कभी तो जीवन की साधारण और घिसी-पिटी सीमाओं को लाँघना चाहता ही है, अगर एतराज न हो तो आओ, जरा खुलकर बातें करें, समझ लो कि मैं तुम्हारा एक पाठक हूँ-एक विचित्र प्रकार का पाठक, जो यह जानना चाहता है कि कोई पुस्तक-मिसाल के लिए तुम्हारी अपनी लिखी हुई पुस्तकें-कैसे और किस उद्देश्य के लिए लिखी गयी है, बोलो, इस तरह की बातचीत पसंद करोगे?"

"ओह, जरूर !" मैंने कहा, "मुझे खुशी होगी, ऐसे आदमी से बात करने का अवसर रोज-रोज नहीं मिलता," लेकिन मैंने यह झूठ कहा था, क्योंकि मुझे यह सब बेहद नागवार मालूम हो रहा था, फिर भी मैं उसके साथ चलता रहा-धीमे कदमों से, शिष्टाचार की ऐसी मुद्रा बनाये, मानो मैं उसकी बात ध्यान से सून रहा हूँ ।

मेरा साथी क्षण भर के लिए चुप हो गया और फिर बड़े विश्वासपूर्ण स्वर में उसने कहा, "मानवीय व्यवहार में निहित उद्देश्यों और इरादों से ज्यादा विचित्र और महत्वपूर्ण चीज इस दुनिया में और कोई नहीं है, तुम यह मानते हो न ?" मैने सिर हिलाकर हामी भरी।

"ठीक, तब आओ, जरा खुलकर बातें करें, सुनो, तुम जब तक जवान हो तब तक खुलकर बात करने का एक भी अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।"

'अजीब आदमी है!' मैंने सोचा, लेकिन उसके शब्दों ने मुझे उलझा लिया था।

"सो तो ठीक है," मैंने मुस्कराते हुए कहा, "लेकिन हम बातें किस चीज के बारे में करेंगे?

पुराने परिचित की भांति उसने घनिष्ठता से मेरी आँखों में देखा और कहा, "साहित्य के उद्देश्यों के बारे में, क्यों, ठीक है न?"

"हाँ मगर....देर काफी हो गया है...."

"ओह, तुम अभी नौजवान हो, तुम्हारे लिए अभी देर नहीं हुई।"

मैं ठिठक गया, उसके शब्दों ने मुझे स्तब्ध कर दिया था । किसी और ही अर्थ में उसने इन शब्दों का उच्चारण किया था और इतनी गंभीरता से किया था कि वे भविष्य का उदघोष मालूम होते थे । मैं ठिठक गया था, लेकिन उसनें मेरी बांह पकड़ी और चुपचाप किंतु दृढ़ता के साथ आगे बढ़ चला।

"रुको नहीं, मेरे साथ तुम सही रास्ते पर हो" उसने कहा, "बात शुरू करो, तुम मुझे यह बताओ कि साहित्य का उद्देश्य क्या है ?" मेरा अचरज बढ़ता जा रहा था और आत्मसंतुलन घटना जा रहा था । आखिर यह आदमी मुझसे चाहता क्या है? और यह है कौन ? निस्संदेह वह एक दिलचस्प आदमी था, लेकिन मैं उससे खीज उठा था । उससे पिंड छुडा़ने की एक और कोशिश करते हुए जरा तेजी से आगे की ओर लपका, लेकिन वह भी पीछे न रहा, साथ चलते हुए शांत भाव से बोला, "मैं तुम्हारी दिक्कत समझ सकता हूँ, एकाएक साहित्य के उद्देश्य की व्याख्या करना तुम्हारे लिए कठिन है, कही तो मैं कोशिश करूँ?"

उसने मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा लेकिन मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना कहने लगा, "शायद बात-बात से तुम सहमत होगे अगर मैं कहू कि साहित्य का उद्देश्य है-खुद अपने को जानने में इंसान की मदद करना, उसके आत्मविश्वास को दृढ़ बनाना और उसके सत्यान्वेषण को सहारा देना, लोगों की अच्छाईयों का उद्-घाटन करना और सौंदर्य की पवित्र भावना से उनके जीवन को शुभ बनाना, क्यों, इतना तो मानते हो ?"

"हाँ," मैंने कहा, "कमोबेश यह सही है, यह तो सभी मानते है कि साहित्य का उद्देश्य लोगों को और अच्छा बनाना है।"

"तब देखो न, लेखक के रुप में तुम कितने ऊँचे उद्देश्य के लिए काम करते हो ! "मेरे साथी ने गंभीरता के साथ अपनी बात पर जोर देते हुए कहा और फिर अपनी वही तीखी हँसी हँसने लगा, "हो-हो-हो !"

यह मुझे बड़ा अपमानजनक लगा। मैं दुख और खीज से चीख उठा, "आखिर तुम मुझसे क्या चाहते हो?"

"आओ, थोड़ी देर बाग में चलकर बैठते हैं।" उसने फिर एक हल्की हँसी हँसते हुए और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे खींचते हुए कहा।

उस समय हम नगर-बाग की एक वीथिका में थे। चारों ओर बबूल और लिलक की नंगी टहनियाँ दिखायी दे रही थीं, जिन पर वर्फ की परत चढ़ी हुई थी । वे चांद की रोशनी में चमचमाती मेरे सिर के ऊपर भी छाई हुई थीं औऱ ऐसा मालूम होता था जैसे वर्फ का कवच पहने ये सख्त टहनियाँ मेरे सीने को बेध कर सीधे मेरे हृदय तक पहुंच गयी हों।

मैंने बिना एक शब्द कहे अपने साथी की ओर देखा, उसके व्यवहार ने मूझे चक्कर में डाल दिया था। 'इसके दिमाग का कोई पूर्जा ढीला मालूम होता है।' मैंने सोचा औऱ इसके व्यवहार की इस व्याख्या से अपने मन को संतोष देने की कोशिश की।

"शायद तुम्हारा खवाल है कि मेरा दिमाग कुछ चल गया है" उसने जैसे मेरे भावों को ताड़ते हुए कहा। "लेकिन ऐसे खयाल को अपने दिमाग से निकाल दो यह तुम्हारे लिए नुकसानदेह और अशोभन है.... बजाय इसके कि हम उस आदमी को समझने की कोशिश करें, जो हमसे भिन्न है। इस बहाने की ओट लेकर हम उसे समझने के झंझट से छुट्टी पा जाना चाहते हैं। मनुष्य के प्रति मनुष्य की दुखद उदासीनता का यह एक बहुत ही पुष्ट प्रमाण है।"

"ओह ठीक है," मैंने कहा । मेरी खीज बराबर बढ़ती ही जा रही थी, "लेकिन माफ करना, मैं अब चलूँगा, काफी समय हो गया।"

"जाओ अपने कंधों को बिचकाते हुए उसने कहा। "जाओ, लेकिन यह जान लो कि तुम खुद अपने से भाग रहे हो।" उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और मैं वहाँ से चल दिया।

वह बाग में ही टीले पर रुक गया। वहा से वोल्गा नज़र आती थी जो अब बर्फ की चादर ताने थी और ऐसा मालूम होता था जैसे बर्फ की उस चादर पर सड़कों के काले फीते टंके हों, सामने दूर तट के निस्तब्ध और उदासी में डूबे विस्तृत मैदान फैले थे। वह वहीं पड़ी हुई एक बैंच पर बैठ गया और सूने मैदानों की ओर ताकता हुआ सीटी की आवाज़ में एक परिचित गीत की धुन गुनगुननाने लगा।

वो क्या दिखायेंगे राह हमको

जिन्हें खुद अपनी ख़बर नहीं

मैंने घुमकर उसकी ओर देखा अपनी कुहनी को घुटने पर और ठोडी की हथेली पर टिकाये, मुँह से सीटी बजाता, वह मेरी ही ओर नज़र जमाये हुए था और चांदनी से चमकते उसने चेहरे पर उसकी नन्हीं काली मूंछें फड़क रही थीं। यह समझकर कि यही विधि का विधान है, मैंने उसके पास लौटने का निश्चय कर लिया। तेज कदमों से मैं वहां पहुँचा और उसके बराबर में बैठ गया।

"देखो, अगर हमें बात करनी है तो सीध-सादे ढंग से करनी चाहिए," मैने आवेशपूर्वक लेकिन स्वयं को संयत रखते हुए कहा।

"लोगों को हमेशा ही सीधे-सादे ढंग से बात करनी चाहिए।" उसने सिर हिलाते हुए स्वीकार किया, "लेकिन यह तुम्हें भी मानना पड़ेगा कि अपने उस ढंग से काम लिये बिना मैं तुम्हारा ध्यान आकर्षित नहीं कर सकता था। आजकल सीधी-सादी और साफ बातों को नीरस और रूखी कहकर नज़रअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन असल बात यह है कि हम खुद ठंडे और कठोर हो गये हैं और इसीलिए हम किसी भी चीज में जोश या कोमलता लाने में असमर्थ रहते हैं । हम तुच्छ कल्पनाओं और दिवास्तप्नों में रमना तथा अपने आपको कुछ विचित्र और अनोखा जताना चाहते हैं, क्योंकि जिस जीवन की हमने रचना की है, वह नीरस, बेरंग और उबाऊ है, जिस जीवन को हम कभी इतनी लगन और आवेश के साथ बदलने चले थे, उसने हमें कुचल और तोड़ डाला है "एक पल चुप रहकर उसने पूछा," क्यों, मैं ठीक कहता हूं न ?"

"हाँ," मैंने कहा, "तुम्हारा कहना ठीक है,"

"तुम बड़ी जल्दी घुटने टेक देते हो!" त़ीखी हँसी हँसते हुए मेरे प्रतिवादी न मेरा मखौल उडाया। मैं पस्त हो गया। उसने अपनी पैनी नज़र मुझ-पर जमा दी और मुस्कराता हुआ बोला, "तुम जो लिखते हो उसे हजारों लोग पढ़ते हैं। तुम किस चीज का प्रचार करते हो? और क्या तुमने कभी अपने से यह पूछा है कि दूसरों को सीख देने का तुम्हें क्या अधिकार है?"

जीवन में पहली बार मैंने अपनी आत्मा को टटोला, उसे जांचा-परखा। हाँ, तो मैं किस चीज का प्रचार करता हूँ? लोगों से कहने के लिए मेरे पास क्या है? क्या वे ही सब चीजें, जिन्हें हमेशा कहा-सुना जाता है, लेकिन जो आदमी को बदल कर बेहतर नहीं बनातीं? और उन विचारों तथा नीतिवचनों का प्रचार करने का मुझे क्या हक है, जिनमें न तो मैं यकीन करता हूँ और न जिन्हें मैं लाता हूँ? जब मैंने खुद उनके खिलाफ आचरण किया, तब क्या यह सिद्ध नहीं होता कि उनकी सच्चाई में मेरा विश्वास नहीं है? इस आदमी को मैं क्या जवाब दूँ जो मेरी बगल में बैठा है?

लेकिन उसने, मेरे जवाब की प्रतीक्षा से ऊब कर, फिर बोलना शुरू कर दिया, "एक समय था जब यह धरती लेखन-कला विशारदों, जीवन और मानव-हृदय के अध्येताओं और ऐसे लोगों से आबाद थी जो दुनिया को अच्छा बनाने की सर्वप्रबल आकांक्षा एवं मानव-प्रकृति में गहरे विश्वास से अनुप्राणित थे, उन्होंने ऐसी पुस्तकें लिखीं जो कभी विस्मृति के गर्भ में विलीन नहीं होंगी, कारण, वे अमर सच्चाइयों को अंकित करती हैं और उनके पन्नों से कभी मलिन न होने वाला सौंदर्य प्रस्फुटित होता है । उनमें चित्रित पात्र जीवन के सच्चे पात्र हैं, क्योंकि प्रेरणा ने उनमें जान फूंकी है, उन पुस्तकों में साहस है, दहकता हुआ गुस्सा और उन्मुक्त सच्चा प्रेम है, और उनमें एक भी शब्द भरती का नहीं है। "तुमने, मैं जानता हूं, ऐसी ही पुस्तकों से अपनी आत्मा के लिए पोषण ग्रहण किया है, फिर भी तुम्हारी आत्मा उसे पचा नहीं सकी, सत्य और प्रेम के बारे में तुम जो लिखते हो, वह झूठा और अनुभूतिशून्य प्रतीत होता है, लगता है, जैसे शब्द जबरदस्ती मुँह से निकाले जा रहे हों, चंद्रमा की तरह तुम दूसरे की रोशनी से चमकते हो, और यह रोशनी भी बुरी तरह मलिन है-वह परछाइयाँ खूब डालती है, लेकिन आलोक कम देती है और गरमी तो उसमें जरा भी नहीं हैं। "असल में तुम खुद गरीब हो, इतने कि दूसरों को ऐसी कोई चीज नहीं दे सकते जो वस्तुतः मूल्यवान हो, और जब देते भी हो तो सर्वोच्च संतोष की इस सजग अनुभूति के साथ नहीं कि तुमने सुंदर विचारों और शब्दों की निधि में वृद्धि करके जीवन को संपन्न बनाया है, तुम केवल इसलिए देते हो कि जीवन से और लोगों से अधिकाधिक ले सको, तुम इतने दरिद्र हो कि उपहार नही दे सकते, या तुम सूदखोर हो और अनुभव के टुकड़ों का लेनदेन करते हो, ताकि तुम ख्याति के रूप में सूद बटोर सको।

"तुम्हारी लेखनी चीजों की सतह को ही खरोंचती है। जीवन की तुच्छ परिस्थितियों को ही तुम निरर्थक ढंग से कोंचते-कुरेदते रहते हो। तुम साधारण लोगों के साधारण भावों का वर्णन करते रहते हो, हो सकता है, इससे तुम उन्हें अनेक साधारण-महत्वहीन-सच्चाइयां सिखाते हो, लेकिन क्या तुम कोई ऐसी रचना भी कर सकते हो जो मनुष्य की आत्मा को ऊँचा उठाने की क्षमता रखती हो ? नहीं ! तो क्या तुम सचमुच इसे इतना मह्तवपूर्ण समझते हो कि हर जगह पड़े हुए कूड़े के ढेरों को कुरेदा जाये और यह सिद्ध किया जाये कि मनुष्य बुरा है, मूर्ख है, आत्मसम्मान की भावना से बेखबर है, परिस्थितियों का गुलाम है, पूर्णतया और हमेशा के लिए कमजोर, दयनीय और अकेला हैं?

"अगर तुम पूछो तो मनुष्य के बारे में ऐसा घृणित प्रचार मानवता के शत्रु करते हैं-और दुख की बात यह है कि वे मनुष्य के हृदय में यह विश्वास जमाने में सफल भी हो चुके हैं, तुम ही देखो, मानव-मस्तिष्क आज कितना ठस हो गया है और उसकी आत्मा के तार कितने बेआवाज़ हो गये हैं, यह कोई अचरज की बात नहीं है, वह अपने आपको उसी रूप में देखता है जैसा कि वह पुस्तकों में दिखाया जाता है......

"और पुस्तकें-खास तौर से प्रतिभा का भ्रम पैदा करने वाली वाक्-चपलता से लिखी गयी पुस्तकें-पाठकों को हतबुद्धि करके एक हद तक उन्हें अपने वश में कर लेती हैं, अगर उनमें मनुष्य को कमजोर, दयनीय, अकेला दिखाया गया है तो पाठक उनमें अपने को देखते समय अपना भोंडापन तो देखता है, लेकिन उसे यह नज़र नहीं आता कि उसके सुधार की भी कोई संभावना हो सकती है । क्या तुममें इस संभावना को उभारकर रखने की क्षमता है ? लेकिन यह तुम कैसे कर सकते हो, जबकि तुम खुद ही.... जाने दो, मैं तुम्हारी भावनाओं को चोट नहीं पहुँचाऊंगा, क्योंकि मेरी बात काटने या अपने को यही ठहराने की कोशिश किये बिना तुम मेरी बात सून रहे हो।

"तुम अपने आपको मसीहा के रूप में देखते हो, समझते हो कि बुराइयों को खोल कर रखने के लिए खुद ईश्वर ने तुम्हें इस दुनिया में भेजा है, ताकि अच्छाइयों की विजय हो, लेकिन बुराइयों को अच्छाइयों से छांटते समय क्या तुमने यह नहीं देखा कि ये दोनों एक-दूसरो से गुंथी हुई हैं और इन्हें अलग नहीं किया जा सकता? मुझे तो इसमें भी भारी संदेह है कि खुदा ने तुम्हें अपना मसीहा बना कर भेजा है । अगर वह भेजता तो तुमसे ज्यादा मजबूत इंसानों को इस काम के लिए चुनता, उनके हृदयों में जीवन, सत्य और लोगों के प्रति गहरे प्रेम की जोत जगाता ताकि वे अंधकार में उसके गौरव और शक्ति का उद्घोष करने वाली मशालों की भांति आलोक फैलायें, तुम लोग तो शैतान की मोहर दागने वाली छड़ की तरह धुआं देते हो, और यह धुआँ लोगों को आत्मविश्वासहीनता के भावों से भर देता है । इसलिय तुमने और तुम्हारी जाति के अन्य लोगों ने जो कुछ भी लिखा है, उस सबका एक सचेत पाठक, मैं तुमसे पूछता हूँ-तुम क्यों लिखते हो? तुम्हारी कृतियाँ कुछ नहीं सिखातीं और पाठक सिवा तुम्हारे किसी चीज पर लज्जा अनुभव नहीं करता, उनकी हर चीज आम-साधारण है, आम-साधारण लोग, आम साधारण विचार, आम-साधारण घटनाएं ! आत्मा के विद्रोह और आत्मा के पुनर्जांगरण के बारे में तुम लोग कब बोलना शुरू करोगे ? तुम्हारे लेखन में रचनात्मक जीवन की वह ललकार कहाँ है, वीरत्व के दृष्टांत और प्रोत्साहन के वे शब्द कहाँ हैं, जिन्हें सुनकर आत्मा आकाश की ऊंचाइयों को छूती है? "शायद तुम कहो- 'जो कुछ हम पेश करते हैं, उसके सिवा जीवन में अन्य नमूने मिलते कहाँ है?'

न, ऐसी बात मुँह से न निकालना, यह लज्जा और अपमान की बात है कि वह, जिसे भगवान ने लिखने की शक्ति प्रदान की है । जीवन के सम्मुख अपनी पंगुता और उससे ऊपर उठने में अपनी असमर्थता को स्वीकार करे, अगर तुम्हारा स्तर भी वही है, जो आम जीवन का, अगर तुम्हारी कल्पना ऐसे नमूनों की रचना नहीं कर सकती जो जीवन में मौजूद न रहते हुए भी उसे सुधारने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, तब तुम्हारा कृतित्व किस मर्ज की दवा है ? तब तुम्हारे धंधे की क्या सार्थकता रह जाती है?

"लोगों के दिमागों को उनके घटनाविहीन जीवन के फोटोग्राफिक चित्रों का गोदाम बनाते समय अपने हृदय पर हाथ रखकर पूछो कि ऐसा करके क्या तुम नुकसान नहीं पहुँचा रहे हो ? कारण-और तुम्हें अब यह तुरंत स्वीकार कर लेना चाहिए-कि तुम जीवन का ऐसा चित्र पेश करने का ढंग, नहीं जानते जो लज्जा की एक प्रतिशोधपूर्ण चेतना को जन्म दे, जीवन के नए जीवन के स्पंदन को तीव्र और उसमें स्फूर्ति का संचार करना चाहते हो, जैसा कि अन्य लोग कर चुके हैं?"

मेरा विचित्र साथी रुक गया और मैं, बिना कुछ बोले, उसके शब्दों पर सोचता रहा, थोड़ी देर बाद उसने फिर कहा, "एक बात और, क्या तुम ऐसी आह्लादपूर्ण हास्य-रचना कर सकते हो,जो आत्मा का सारा मैल धो डाले? देखो न, लोग एकदम भूल गये हैं कि ठीक ढंग से कैसे हँसा जाता है ! वे कुत्सा से हँसते हैं, वे कमीनपन से हँसते हैं, वे अक्सर अपने आँसुओं की बेधकर हँसते हैं, वे हृदय के उस समूच उल्लास से कभी नहीं हँसते जिससे वयस्कों के पेट में बल पड़ जाते हैं, पसलियां बोलने लगती हैं, अच्छी हंसी एक स्वास्थ्यप्रद चीज है। यह अत्यंत आवश्यक है कि लोग हमें, आखिर हँसने की क्षमता उन गिनी-चुनी चीजों में से एक है, जो मनुष्य को पशु से अलग करती हैं, क्या तुम निदा की हँसी के अवाला अन्य किसी प्रकार की हँसी को भी जन्म दे सकते हो? निंदा की हंसीँ तो बाजारू हँसी है, जो मानव जीवधारियों को केवल हँसी का पात्र बनाती है कि उसकी स्थिति दयनीय है।

"तुम्हें अपने हृदय में मनुष्य की कमजोरियों के लिए महान घृणा का और मनुष्य के लिए महान प्रेम का पोषण करना चाहिए, तभी तुम लोगों को सीख देने के अधिकारी बन सकोगे, अगर तुम घृणा और प्रेम, दोनों में से किसी का अनुभव नहीं कर सकते, तो सिर नीचा रखो और कुछ कहने से पहले सौ बार सोचो"

सुबह की सफेदी अब फूट चली थी, लेकिन मेरे हृदय में अंधेरे गहरा रहा था, यह आदमी, जो मेरे अंतर के सभी भेदों से वाकिफ था, अब भी बोल रहा था।

"सब कुछ के बावजूद जीवन पहले से अधिक प्रशस्त और अधिक गहरा होता जा रहा है, लेकिन यह बहुत धीमी गति से हो रहा है, क्योंकि तुम्हारे पास इस गति को तेज़ बनाने के लायक न तो शक्ति है, न ज्ञान, जीवन आगे बढ़ रहा है और लोग दिन पर दिन अधिक और अधिक जानना चाहते हैं । उनके सवालों के जवाब कौन दें? यह तुम्हारा काम है लेकिन क्या तुम जीवन में इतने गहरे पैठे हो कि उसे दूसरों के सामने खोल कर रख सको? क्या तुम जानते हो कि समय की मांग क्या है? क्या तुम्हें भविष्य की जानकारी है और क्या तुम अपने शब्दों से उस आदमी में नई जान फूंक सकते हो जिसे जीवन की नीचता ने भ्रष्ट और निराश कर दिया है?"

यह कहकर वह चुप हो गया । मैंने उसकी ओर नहीं देखा। याद नहीं कौन-सा भाव मेरे हृदय में छाया हुआ था-शर्म का अथवा डर का। मैं कुछ बोल भी नहीं सका।

"तुम कुछ जवाब नहीं देते?" उसी ने फिर कहा, "खैर, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं तुम्हारे मन की हालत समझ सकता हूँ अच्छा, तो अब मैं चला."

"इतनी जल्दी?" मैने धीमी आवाज़ में कहा. कारण, मैं उससे चाहे जितना भयभीत रहा होऊँ, लेकिन उससे भी अधिक मैं अपने आपसे डर रहा था।

"हाँ, मैं जा रहा हूँ। लेकिन मैं फिर आऊँगा. मेरी प्रतीक्षा करना।"

और वह चला गया । लेकिन क्या वह सचमुच चला गया ? मैंने उसे जाते हुए नहीं देखा । वह इतनी तेजी से और खामोशी से गायब हो गया जैसे छाया। मैं वहीं बाग में बैठा रहा- जाने कितनी देर तक-और न मुझे ठंड का पता था, न इस बात का कि सूरज उग आया है और पेड़ों की बर्फ से ढंकी टहनियों पर चमक रहा है।

अनुवाद - अनिल जनविजय

 

 

कोलुशा
(Kolusha)

कब्रिस्तान का वह कोना, जहाँ भिखारी दफ़नाये जाते हैं। पत्तों से छितरे, बारिश से बहे और आँधियों से जर्जर कब्रों के ढूहों के बीच, दो मरियल-से बर्च वृक्षों के जालीदार साये में, जिघम के फटे-पुराने कपड़े पहने और सिर पर काली शॉल डाले एक स्त्री एक कब्र के पास बैठी थी।

सफ़ेद पड़ चले बालों की एक लट उसके मुरझाये हुए गाल के ऊपर झूल रही थी, उसके महीन होंठ कसकर भिचे थे और उनके छोर उसके मुँह पर उदास रेखाएँ खींचते नीचे की ओर झुके थे, और उसकी आँखों की पलकों में भी एक ऐसा झुकाव मौजूद था जो अधिक रोने और काटे न कटने वाली लम्बी रातों में जागने से पैदा हो जाता है।

वह बिना हिले-डुले बैठी थी – उस समय, जबकि मैं कुछ दूर खड़ा उसे देख रहा था, न ही उसने उस समय कुछ हरकत की जब मैं और अधिक निकट खिसक आया। उसने केवल अपनी बड़ी-बड़ी चमकविहीन आँखों को उठाकर मेरी आँखों में देखा और फिर उन्हें नीचे गिरा लिया। उत्सुकता, परेशानी या अन्य कोई भाव, जोकि मुझे निकट पहुँचता देख उसमें पैदा हो सकता था, नाममात्र के लिए भी उसने प्रकट नहीं किया।

मैंने अभिवादन में एकाध शब्द कहा और पूछा कि यहाँ कौन सोया है।

‘मैरा बेटा,” उसने भावशून्य उदासीनता से जवाब दिया।

“बड़ा था?”

“बारह बरस का।”

“कब मरा?”

“चार साल पहले।”

उसने एक गहरी साँस ली और बाहर छिटक आयी लट को फिर बालों के नीचे खोंस लिया। दिन गरम था। सूरज बेरहमी के साथ मुर्दों के इस नगर पर आग बरसा रहा था। कब्रों पर उगी इक्की-दुक्की घास तपन और धूल से पीली पड़ गयी थी। और धूल-धूसरित रूखे-सूखे पेड़, जो सलीबों के बीच उदास भाव से खड़े थे, इस हद तक निश्चल थे मानो वे भी मुर्दा बन गये हों।

“वह कैसे मरा?” लड़के की कब्र की ओर गरदन हिलाते हुए मैंने पूछा।

“घोड़ों से कुचलकर,” उसने संक्षेप में जवाब दिया और अपना झुर्रियाँ-पड़ा हाथ फैलाकर लड़के की कब्र सहलाने लगी।

“यह दुर्घटना कैसे घटी?”

मैं जानता था कि इस तरह खोदबीन करना शालीनता के खि़लाफ़ है, लेकिन इस स्त्री की निस्संगता ने गहरे कौतुक और चिढ़ का भाव मेरे हृदय में जगा दिया था। कुछ ऐसी समझ में न आने वाली सनक ने मुझे घेरा कि मैं उसकी आँखों में आँसू देखने के लिए ललक उठा। उसकी उदासीनता में कुछ था, जो अप्राकृतिक था, और साथ ही उसमें बनावट का भी कोई चिह्न नहीं दिखायी देता था।

मेरा सवाल सुनकर उसने एक बार फिर अपनी आँखें उठाकर मेरी आँखों में देखा। और जब वह सिर से पाँव तक मुझे अपनी नज़रों से परख चुकी तो उसने एक हल्की-सी साँस ली और अटूट उदासी में डूबी आवाज़ में अपनी कहानी सुनानी शुरू की।

“घटना इस प्रकार घटी। उसका पिता गबन के अपराध में डेढ़ साल के लिए जेल में बन्द हो गया। इस काल में हमने अपनी सारी जमा पूँजी खा डाली। यूँ हमारी वह जमा पूँजी कुछ अधिक थी भी नहीं। अपने आदमी के जेल से छूटने से पहले ईंधन की जगह मैं हार्स-रेडिश के डण्ठल जलाती थी। जान-पहचान के एक माली ने ख़राब हुए हार्स-रेडिश का गाड़ीभर बोझ मेरे घर भिजवा दिया था। मैंने उसे सुखा लिया और सूखी गोबर-लीद के साथ मिलाकर उसे जलाने लगी। उससे भयानक धुआँ निकलता और खाने का जायका ख़राब हो जाता। कोलुशा स्कूल जाता था। वह बहुत ही तेज़ और किफायतशार लड़का था। जब वह स्कूल से घर लौटता तो हमेशा एकाध कुन्दा या लकड़ियाँ – जो रास्ते में पड़ी मिलतीं – उठा लाता। वसन्त के दिन थे तब। बर्फ पिघल रही थी। और कोलुशा के पास कपड़े के जूतों के सिवा पाँवों में पहनने के लिए और कुछ नहीं था। जब वह उन्हें उतारता तो उसके पाँव लाल रंग की भाँति लाल निकलते। तभी उसके पिता को उन्होंने जेल से छोड़ा और गाड़ी में बैठाकर उसे घर लाये। जेल में उसे लकवा मार गया था। वह वहाँ पड़ा मेरी ओर देखता रहा। उसके चेहरे पर एक कुटिल-सी मुस्कान खेल रही थी। मैं भी उसकी ओर देख रही थी और मन ही मन सोच रही थी – ‘तुमने ही हमारा यह हाल किया है, और तुम्हारा यह दोज़ख़ मैं अब कहाँ से भरूँगी? एक ही काम अब मैं तुम्हारे साथ कर सकती हूँ, वह यह कि तुम्हें उठाकर किसी जोहड़ में पटक दूँ।’ लेकिन कोलुशा ने जब उसे देखा तो चीख़ उठा, उसका चेहरा धुली हुई चादर की भाँति सफ़ेद पड़ गया और उसके गालों पर से आँसू ढुरकने लगे। ‘यह इन्हें क्या हो गया है, माँ?’ उसने पूछा। ‘यह अपने दिन पूरे कर चुका’, मैंने कहा। और इसके बाद हालत बद से बदतर होती गयी। काम करते-करते मेरे हाथ टूट जाते, लेकिन पूरा सिर मारने पर भी बीस कोपेक से ज़्यादा न मिलते, सो भी तब, जब भाग्य से दिन अच्छे होते। मौत से भी बुरी हालत थी, अक्सर मन में आता कि अपने इस जीवन का अन्त कर दूँ। एक बार, जब हालत एकदम असह्य हो उठी, तो मैंने कहा – ‘मैं तो तंग आ गयी इस मनहूस जीवन से। अच्छा हो अगर मैं मर जाऊँ – या फिर तुम दोनों में से कोई एक ख़त्म हो जाये!’ – यह कोलुशा और उसके पिता की तरफ़ इशारा था। उसका पिता केवल गरदन हिलाकर रह गया, मानो कह रहा हो – ‘झिड़कती क्यों हो? ज़रा धीरज रखो, मेरे दिन वैसे ही करीब आ लगे हैं।’ लेकिन कोलुशा ने देर तक मेरी ओर देखा, इसके बाद वह मुड़ा और घर से बाहर चला गया। उसके जाते ही अपने शब्दों पर मुझे बड़ा पछतावा हुआ। लेकिन अब पछताने से क्या होता था? तीर हाथ से निकल चुका था। एक घण्टा भी न बीता होगा कि एक पुलिसमैन गाड़ी में बैठा हुआ आया। ‘क्या तुम्हीं शिशेनीना साहिबा हो?’ उसने कहा। मेरा हृदय बैठने लगा। ‘तुम्हें अस्पताल में बुलाया है’, वह बोला – ‘तुम्हारा लड़का सौदागर आनोखिन के घोड़ों से कुचल गया है।’ गाड़ी में बैठ मैं सीधे अस्पताल के लिए चल दी। ऐसा मालूम होता था जैसे गाड़ी की गद्दी पर किसी ने गर्म कोयले बिछा दिये हों। और मैं रह-रहकर अपने को कोस रही थी – ‘अभागी औरत, तूने यह क्या किया?’

“आखि़र हम अस्पताल पहुँचे। कोलुशा पलंग पर पड़ा पट्टियों का बण्डल मालूम होता था। वह मेरी ओर मुस्कुराया, और उसके गालों पर आँसू ढुरक आये…. फिर फुसफुसाकर बोला – ‘मुझे माफ़ करना, माँ। पैसा पुलिसमैन के पास है।’ ‘पैसा….कैसा पैसा? यह तुम क्या कह रहे हो?’ मैंने पूछा। ‘वही, जो लोगों ने मुझे सड़क पर दिया था और आनोखिन ने भी’, उसने कहा। ‘किसलिए?’ मैंने पूछा। ‘इसलिए’, उसने कहा और एक हल्की-सी कराह उसके मुँह से निकल गयी। उसकी आँखें फटकर ख़ूब बड़ी हो गयीं, कटोरा जितनी बड़ी। ‘कोलुशा’, मैंने कहा – ‘यह कैसे हुआ? क्या तुम घोड़ों को आता हुआ नहीं देख सके?’ और तब वह बोला, बहुत ही साफ़ और सीधे-सीधे, ‘मैंने उन्हें देखा था, माँ, लेकिन मैं जान-बूझकर रास्ते में से नहीं हटा। मैंने सोचा कि अगर मैं कुचला गया तो लोग मुझे पैसा देंगे। और उन्होंने दिया।’ ठीक यही शब्द उसने कहे। और तब मेरी आँखें खुलीं और मैं समझी कि उसने – मेरे फ़रिश्ते ने – क्या कुछ कर डाला है। लेकिन मौका चूक गया था। अगली सुबह वह मर गया। उसका मस्तिष्क अन्त तक साफ़ था और वह बराबर कहता रहा – ‘दद्दा के लिए यह ख़रीदना, वह ख़रीदना और अपने लिए भी कुछ ले लेना।’ मानो धन का अम्बार लगा हो। वस्तुतः वे कुल सैंतालीस रूबल थे। मैं सौदागर आनोखिन के पास पहुँची, लेकिन उसने मुझे केवल पाँच रूबल दिये, सो भी भुनभुनाते हुए। कहने लगा – ‘लड़का ख़ुद जान-बूझकर घोड़ों के नीचे आ गया। पूरा बाज़ार इसका साक्षी है। सो तुम क्यों रोज़ आ-आकर मेरी जान खाती हो? मैं कुछ नहीं दूँगा।’ मैं फिर कभी उसके पास नहीं गयी। इस प्रकार वह घटना घटी, समझे युवक!”

उसने बोलना बन्द कर दिया और पहले की भाँति अब फिर सर्द तथा निस्संग हो गयी।

कब्रिस्तान शान्त और वीरान था। सलीब, मरियल-से पेड़, मिट्टी के ढूह और कब्र के पास इस शोकपूर्ण मुद्रा में बैठी यह मनोविकारशून्य स्त्री – इन सब चीज़ों ने मुझे मृत्यु और मानवीय दुख के बारे में सोचने के लिए बाध्य कर दिया।

लेकिन आकाश में बादलों का एक धब्बा तक नहीं था और वह धरती पर झुलसा देने वाली आग बरसा रहा था।

मैंने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और उन्हें इस स्त्री की ओर बढ़ा दिया जो, दुर्भाग्य की मारी, अभी भी जी रही थी।

उसने सिर हिलाया और विचित्र धीमेपन के साथ बोली -

“कष्ट न करो, युवक। आज के लिए मेरे पास काफ़ी है। आगे के लिए भी मुझे अधिक नहीं चाहिए। मैं एकदम अकेली हूँ। इस दुनिया में एकदम अकेली!”

उसने एक गहरी साँस ली और अपने पतले होंठ एक बार फिर उसी शोक से बल-खाई रेखा में भींच लिये।

 

 

 

जियोवान्नी समाजवादी कैसे बना
(How Giovanni became socialist)

अंगूरों के पुराने बगीचे की घनी अंगूर लताओं के बीच छिपी-सी सफेद कैण्टीन के दरवाजे के पास, हरिणपदी तथा छोटे-छोटे चीनी गुलाबों से जहाँ-तहाँ गुँथी इन्हीं लताओं के चँदवे के नीचे शराब की सुराही सामने रखे हुए दो आदमी मेज़ पर बैठे हैं। इनमें से एक हैं रंगसाज विंचेंत्सो और दूसरा है फिटर जियोवान्नी। रंगसाज नाटा-सा, दुबला-पतला और काले बालोंवाला है। उसकी काली आँखों में स्वप्नदर्शी की चिन्तनशील हल्की-हल्की मुस्कान की चमक है। यद्यपि उसने ऊपरवाले होंठ और गालों की इतनी कसकर हजामत बनायी है कि वे नीले-से हो गये हैं, तथापि मुक्त मुस्कान के कारण उसका चेहरा बच्चों जैसा और भोला-भाला प्रतीत होता है। उसका मुँह लड़की जैसा छोटा-सा और सुन्दर है, कलाइयाँ लम्बी-लम्बी हैं, गुलाब के सुनहरे फूल को वह अपनी चंचल-चपल उँगलियों में घुमा रहा है और फिर उसे अपने फूले-फूले होंठों के साथ सटाकर आँखें मूँद लेता है।

“हो सकता है – मुझे मालूम नहीं – हो सकता है!” कनपटियों पर दबे-से सिर को धीरे-धीरे हिलाते हुए वह कहता है और उसके चैड़े माथे पर ललछौंही केश-कुण्डल लटक आते हैं।

“हाँ, हाँ, ऐसा ही है। हम उत्तर की ओर जितना अधिक बढ़ते जाते हैं, उतने ही ज़्यादा धुन के पक्के लोग हमें मिलते हैं!” बड़े सिर, चैड़े-चकले कन्धों और काले घुँघराले बालोंवाला जियोवान्नी दृढ़तापूर्वक अपनी बात कहता है। उसका चेहरा ताँबे जैसी लालिमा लिये हुए है, उसकी नाक धूप में जली हुई है और उस पर मुरझायी-सी सफ़ेद झिल्ली चढ़ी हुई है। उसकी आँखें बैल की आँखों की तरह बड़ी-बड़ी और दयालु हैं और बाँये हाथ का अँगूठा ग़ायब है। उसका बोलने का ढंग भी मशीनी तेल और लोहे के बुरादे से सने हाथों की धीमी गतिविधि की तरह ही धीमा है। टूटे नाखूनोंवाली साँवली उँगलियों में शराब का गिलास पकड़े हुए वह भारी-भरकम आवाज़ में अपनी बात जारी रखता है:

“मिलान, तूरिन – ये हैं बढ़िया कारख़ाने, जहाँ नये किस्म के लोग ढाले जा रहे हैं, नये विचारोंवाले दिमाग़ जन्म ले रहे हैं। थोड़ा सब्र करो – हमारी दुनिया ईमानदार और समझदार हो जायेगी!”

“हाँ!” नाटे रंगसाज ने कहा और गिलास उठाकर सूर्य-किरण को शराब में घुलाते हुए गाने लगता है:

जीवन के प्रभात में कितनी

सुखद हमें धरती लगती,

किन्तु यही दुखमय बन जाती

उम्र हमारी जब ढलती।

“मैं कहता हूँ कि हम जितना अधिक उत्तर की ओर जाते हैं, काम भी उतना ही अधिक अच्छा होता जाता है। फ्रांसीसी ही वैसी काहिली का जीवन नहीं बिताते जैसा कि हम, उनके आगे जर्मन हैं और फिर रूसी – ये हैं असली लोग!” “हाँ!”

“अधिकारहीन, आज़ादी और ज़िन्दगी से वंचित हो जाने के डर से उन्होंने बड़े-बड़े शानदार कारनामे कर दिखाये। इन्हीं की बदौलत तो सारे पूरब में ज़िन्दगी की लहर दौड़ गयी है!”

“बहादुरों का देश है!” रंगसाज ने सिर झुकाकर कहा। “यही मन होता है कि उनके साथ रहता…”

“तुम?” अपने घुटने पर हाथ मारते हुए रंगसाज चिल्ला उठा। “एक हफ़्ते बाद बर्फ का डला बनकर रह जाते!”

दोनों ख़ुशमिज़ाजी से खुलकर हँस दिये।

इनके चारों ओर नीले और सुनहरे फूल थे, हवा में सूर्य-किरणों के फीते-से थरथरा रहे थे, सुराही और गिलासों के पारदर्शी शीशे में से गहरे लाल रंग की शराब लौ दे रही थी और दूर से सागर की रेशमी-सी सरसराहट सुनायी पड़ रही थी।

“मेरे नेकदिल दोस्त विंचेंत्सो,” खुली मुस्कान के साथ फिटर ने कहा, “तुम कविता में यह बयान करो कि मैं समाजवादी कैसे बना? तुम यह किस्सा जानते हो न?”

“नहीं तो,” रंगसाज ने गिलासों में शराब डालते और मदिरा की लाल धारा को देखकर मुस्कराते हुए कहा, “तुमने कभी इसकी चर्चा ही नहीं की। यह तो तुम्हारी हड्डियों में ऐसे रचा हुआ है कि मैंने सोचा – तुम ऐसे ही पैदा हुए थे।”

“मैं वैसे ही नंगा और बुद्धू पैदा हुआ था, जैसे तुम और बाकी सभी लोग। जवानी में मैं अमीर बीवी के सपने देखता रहा और फौज में जाकर इसलिए ख़ूब पढ़ाई करता रहा कि किसी तरह अफसर बन जाऊँ। मैं तेईस साल का था जब मैंने यह अनुभव किया कि दुनिया में ज़रूर कुछ गड़बड़-घोटाला है और उल्लू बने रहना शर्म की बात है!”

रंगसाज ने मेज़ पर कोहनियाँ टिका दीं, सिर ऊपर को कर लिया और पहाड़ की तरफ़ देखने लगा जिसके सिरे पर अपनी शाखाओं को झुलाते हुए विराट सनोबर खड़े थे।

“हमें यानी हमारी फौज कम्पनी को बोलोन्या भेजा गया। वहाँ किसानों में हलचल हो गयी थी। उनमें से कुछ यह माँग करते थे कि मालगुजारी कम की जाये और दूसरे यह चीख़ते थे कि उनकी मज़दूरी बढ़ायी जाये। मुझे लगा कि दोनों ही ग़लत हैं। मालगुजारी कम की जाये, मज़दूरी बढ़ायी जाये – कैसी बेवकूफ़ी की बात है यह! – मैंने सोचा। ऐसा करने से तो जमींदार तबाह हो जायेंगे। मुझे, शहर के रहनेवाले को तो यह बकवास और बड़ी बेतुकी बात लगी। सो मैं बुरी तरह झल्ला उठा, बेहद गर्मी, एक जगह से दूसरी जगह पर लगातार दौड़-धूप और रातों को पहरेदारी – इन सब चीज़ों ने आग में घी डालने का काम किया। वे किसान पट्ठे तो ज़मींदारों की मशीनें तोड़ते-फोड़ते थे और साथ ही उन्हें अनाज तथा ज़मींदारों की दूसरी चीजों को आग लगा देना भी अच्छा लगता था।”

उसने छोटे-छोटे घूँट भरते हुए शराब पी और पहले से भी ज़्यादा रंग में आकर कहता गया:

“वे भेड़-बकरियों के रेवड़ों की तरह भीड़ बनाकर खेतों में घूमते थे, लेकिन चुपचाप, रौद्र मुद्रा बनाये और काम-काजी ढंग से। हम उन्हें संगीनें दिखाकर और कभी-कभी बन्दूक़ों के कुन्दों से धकेलकर खदेड़ देते। वे तो डरे-सहमे बिना धीरे-धीरे तितर-बितर होते और फिर से इकट्ठे हो जाते। यह दोपहर की प्रार्थना के समान बड़ा ऊबभरा मामला था और जूड़ी के बुखार की तरह क़िस्सा हर दिन लम्बा ही होता चला गया। अब्रूत्से का रहनेवाला हमारा कार्पारल, जो ख़ुद भी किसान था और बहुत भला नौजवान था, बड़ा दुखी हो उठा, उसका रंग पीला पड़ गया, वह दुबला गया और वह बार-बार यह कहता रहता था:

“‘बड़ी अटपटी स्थिति है, मेरे प्यारो! बेड़ा गर्क, लेकिन लगता यही है कि हमें गोलियाँ चलानी पड़ेंगी।’

“उसकी ऐसी बड़बड़ाहट से हम और भी बौखला गये। और इसी बीच हर कोने, हर टीले और पेड़ के पीछे से अड़ियल-जिद्दी किसानों के चेहरे दिखायी देते थे, उनकी ग़ुस्से से जलती आँखें हमें चुभती-सी प्रतीत होतीं। ज़ाहिर है कि वे लोग दुश्मन की नज़र से देखते थे।”

“पियो!” नाटे विंचेंत्सो ने शराब से भरा हुआ गिलास अपने मित्र की तरफ़ स्नेहपूर्वक बढ़ाते हुए कहा।

“शुक्रिया, और ज़िन्दाबाद धुन के पक्के लोग!” फिटर ने एक ही साँस में गिलास खाली कर दिया, हथेली से मूँछें पोंछी और कहानी को आगे कहता चला गया:

“एक दिन मैं जैतून के पेड़ों के झुरमुट के पास खड़ा हुआ पेड़ों की रखवाली कर रहा था। बात यह थी कि किसान पेड़ों को भी नहीं बख़्शते थे। टीले के नीचे के दो किसान – एक बूढ़ा और दूसरा छोकरा-सा काम कर रहे थे, खाई खोद रहे थे। बेहद गर्मी थी, सूरज आग बरसा रहा था, यही मन होता था कि आदमी मछली बन जाये! मुझे बड़ी ऊब महसूस हो रही थी और अभी तक याद है कि बहुत ही ग़ुस्से से मैं इन लोगों की तरफ़ देखता रहा था। दोपहर होने पर इन्होंने काम बन्द किया, डबल रोटी, पनीर और शराब से भरी सुराही निकाली। तुम पर शैतान की मार – मैंने सोचा। अचानक क्या हुआ कि बूढ़े ने, जिसने अब तक मेरी तरफ़ एक बार भी देखने की तकलीफ़ नहीं की थी, छोकरे से कुछ कहा। छोकरे ने इन्कार करते हुए सिर हिला दिया। तब बूढ़ा बहुत कड़ाई से चिल्लाकर बोला:

“‘जाओ!’

“छोकरा सुराही हाथ में लिये हुए मेरे पास आया और कहना चाहिए कि बहुत मन मारकर बोला:

“‘मेरे पिताजी का ख़याल है कि आपको प्यास लगी है और चाहते हैं कि आप शराब पी लें।’

“बड़ी अजीब, किन्तु सुखद बात थी। मैंने बूढ़े की ओर सिर झुकाकर और इस तरह उसे धन्यवाद देकर शराब पीने से इन्कार कर दिया। बूढ़े ने आकाश की ओर देखते हुए जवाब दिया:

“‘पी लीजिये महानुभाव, पी लीजिये। हम सैनिक को नहीं मानव को यह भेंट कर रहे हैं और इसकी तनिक भी आशा नहीं रखते हैं कि हमारी शराब पीकर सैनिक कुछ दयालु हो जायेगा।’

“‘ऐसा डंक तो न मारो, शैतान के बच्चे!’ मैंने सोचा और कोई तीन घूँट शराब पीकर उन्हें धन्यवाद दिया और वहाँ नीचे, टीले के दामन में वे दोनों भोजन करने लगे। कुछ ही देर बाद सालेरनो का रहनेवाला ऊगो मेरी जगह ड्यूटी पर आ गया। मैंने उससे कहा कि ये दोनों किसान दयालु हैं। उसी शाम को मैं उस बाड़े के दरवाजे के पास खड़ा था जिसमें मशीनें रखी जाती थीं। तभी क्या हुआ कि छत से एक टाइल मेरे सिर पर आकर लगी। वह तो बहुत ज़ोर से नहीं लगी, लेकिन दूसरी टाइल इतने ज़ोर से कन्धे पर आकर गिरी कि मेरा बायाँ हाथ सुन्न हो गया।”

फिटर ख़ूब मुँह खोलकर और आँखें सिकोड़कर ज़ोर से हँस पड़ा।

“उन दिनों वहाँ टाइलों, पत्थरों और लाठियों में भी मानो जान आ गयी थी,” उसने हँसते हुए ही कहा, “इन बेजान चीज़ों ने भी हमारे सिरों की काफ़ी बड़े-बड़े गुमटों से शोभा बढ़ा दी थी। होता क्या था कि कोई सैनिक चला जा रहा है या कहीं खड़ा है, अचानक जमीन फाड़कर कोई लाठी उस पर बरस पड़ती या फिर आसमान से कोई पत्थर उस पर आ गिरता। ज़ाहिर है कि हम ख़ूब जल-भुन गये थे।”

नाटे रंगसाज की आँखों में उदासी झलक उठी, उसका चेहरा फक हो गया और उसने धीमे-से कहा:

“ऐसी बातें सुनकर हमेशा शर्म महसूस होती है…”

“लेकिन किया क्या जाये! लोगों को अक़्ल भी बहुत धीरे-धीरे आती है न! तो आगे सुनो – मैंने मदद के लिए चीख़-फकार की। मुझे एक ऐसे घर में ले जाया गया, जहाँ हमारा एक अन्य सैनिक पहले से ही लेटा हुआ था। पत्थर लगने से उसका चेहरा घायल हो गया था। जब मैंने उससे पूछा कि यह कैसे हुआ तो उसने मरे-मरे ढंग से हँसते हुए जवाब दियाः

“‘साथी, सफ़ेद झोंटेवाली एक चुड़ैल बुढ़िया ने पत्थर दे मारा,’ और फिर बोली – ‘मुझे मार डालो।’

“‘उसे गिरफ़्तार कर लिया गया?’

“‘नहीं, क्योंकि मैंने कहा कि मैं ख़ुद ही गिर गया था और मुझे ऐसे ही चोट लग गयी है। कमाण्डर ने मेरी बात का यक़ीन नहीं किया, यह उसकी आँखें कह रही थीं। लेकिन आप मेरे साथ सहमत होंगे कि बुढ़िया ने मेरा यह हुलिया बन दिया है, ऐसा मानना भी तो बड़ा अटपटा लगता है। शैतान की नानी! उन पर भारी गुज़रती है और यह समझना भी कुछ मुश्किल नहीं कि हम भी उन्हें फूटी आँखों नहीं सुहाते।’

“‘बात ऐसा ही है!’ मैंने सोचा। डाक्टर और उसके साथ दो महिलायें पधारीं। उनमें से एक बहुत ही सुन्दर थी, स्वर्णकेशी, शायद वेनिस की रहनेवाली। दूसरी के बारे में मुझे कुछ याद नहीं। उन्होंने मेरी चोट की जाँच-पड़ताल की। बेशक बड़ी मामूली-सी बात थी, उन्होंने उस पर पट्टी बाँध दी और चले गये।”

फिटर के माथे पर बल पड़ गये, वह कुछ देर तक खामोश रहा और उसने जोर से हाथों को मला। उसके साथी ने गिलास में फिर से शराब डाल दी। शराब डालते समय उसने सुराही को ऊँचा उठाया और शराब लाल, सजीव धारा की तरह हवा में थिरकती रही।

“हम दोनों खिड़की के पास बैठ गये,” फिटर उखड़े-उखड़े-से अन्दाज़ में कहता गया, “सो भी धूप से बचकर। अचानक हमें सुनहरे बालोंवाली सुन्दरी की प्यारी-सी आवाज़ सुनायी दी। वह अपनी सहेली और डाक्टर के साथ बाग़ में से जाते हुए फ्रांसीसी भाषा में, जो मैं बहुत अच्छी तरह समझता हूँ, यह कह रही थीः

“‘आप लोगों ने ध्यान दिया कि उसकी आँखें कैसी हैं? स्पष्ट है कि वह भी किसान है और सैन्य-सेवा ख़त्म होने पर हमारे यहाँ के अन्य सभी किसानों की तरह शायद वह भी समाजवादी बन जायेगा। और ऐसी आँखोंवाले लोग सारी दुनिया को जीत लेना चाहते हैं, जीवन को बिल्कुल नया रंग-रूप देना चाहते है, हमें कहीं खदेड़ देना, नष्ट कर देना चाहते हैं और वह इसलिए किसी अन्धे और ऊबभरे न्याय की जीत का डंका बज जाये!’

“‘बुद्धू लोग हैं,’ डाक्टर ने राय ज़ाहिर की, ‘कुछ-कुछ बच्चे, कुछ-कुछ जानवर।’

“‘जानवर हैं – यह तो सही है। लेकिन उनमें बच्चों जैसा क्या है?’

“‘सभी की समानता के ये सपने…’

“‘ज़रा सोचिये तो – मैं समान हूँ बैल जैसी आँखोंवाले इस नौजवान या परिन्दे जैसे चेहरेवाले उस दूसरे नौजवान के। या फिर हम सभी – आप, मैं और यह, हम समान हैं इन घटिया खूनवालों के! जिन लोगों को अपने जैसों की पिटाई का काम सौपा जा सकता है, वे उन्हीं की तरह जानवर हैं…’

“वह बहुत जोश से बहुत कुछ कहती गयी और मैं सुनता हुआ सोचता रहा – ‘अरे वाह, देवी जी!’ मैंने उसे कई बार पहले भी देखा था और बेशक तुम तो यह जानते ही हो कि शायद ही कोई सैनिक की तरह औरत के सपने देखता हो। ज़ाहिर है कि मैंने कहीं अधिक दयालु, समझदार और नेकदिल औरत के रूप में उसकी कल्पना की थी। उस समय मुझे ऐसा लगता था कि कुलीन तो विशेष रूप से बुद्धिमान लोग होते हैं।

“मैंने अपने साथी से पूछा – ‘तुम यह भाषा समझते हो?’ नहीं, वह फ्रांसीसी नहीं जानता था। तब मैंने उसे वह सबकुछ बताया जो स्वर्णकेशी ने कहा था। मेरा साथी तो ग़ुस्से से लाल-पीला हो गया, अपनी आँख से – दूसरी पर पट्टी बँधी थी – चिंगारियाँ-सी छोड़ते हुए कमरे में ग़ुस्से से उछलने-कूदने लगा।

“‘भई वाह!’ वह बुदबुदाया। ‘भई वाह! वह मुझसे अपना उल्लू सीधा करवाती है और मुझे इन्सान ही नहीं मानती! मैं इसकी ख़ातिर अपनी मान-मर्यादा को अपमानित होने देता हूँ और यही उससे इन्कार करती है! इसकी दौलत-जायदाद की रक्षा के लिए मैं अपनी आत्मा की हत्या का जोखि़म उठा रहा हूँ और…’

“वह कुछ मूर्ख नहीं था और उसने अपने को अत्यधिक अपमानित अनुभव किया, मैंने भी। अगले दिन हमने किसी तरह का संकोच किये बिना इस महिला के बारे में ऊँचे-ऊँचे अपनी राय ज़ाहिर की। लुओतो ने केवल दबी ज़बान में बुदबुदाते हुए कुछ कहा और हमें यह सलाह दी:

“‘सावधानी से काम लो, मेरे प्यारो! यह नहीं भूलना कि तुम फौजी हो और तुम्हारे लिये अनुशासन नाम की भी कोई चीज़ है!’

“नहीं, हम यह नहीं भूले थे। लेकिन हममें से बहुतों ने, सच कहा जाये, तो लगभग सभी ने अपने कान बन्द कर लिये, आँखें मूँद लीं और हमारे किसान दोस्तों ने हमारे इस तरह अन्धे-बहरे हो जाने का ख़ूब अच्छा फ़ायदा उठाया। उन्होंने बाजी जीत ली। बहुत ही अच्छी तरह से पेश आते थे वे हमारे साथ। वह सुनहरे बालोंवाली सुन्दरी उनसे बहुत कुछ सीख सकती थी। उदाहरण के लिए वे उसे बहुत ही अच्छी तरह यह सिखा सकते थे कि सच्चे और ईमानदार लोगों का कैसे आदर किया जाना चाहिए। जहाँ हम ख़ून बहाने के इरादे से गये थे, वहीं से जब विदा हुए तो हममें से बहुतों को फूल भेंट किये गये। जब हम गाँव की सड़कों पर से गुज़रते तो अब हम पर पत्थर और टाइलें नहीं, बल्कि फूल बरसाये जाये थे, मेरे दोस्त। मेरे ख़याल में हम इसके लायक़ थे। मधुर विदाई को याद करते हुए बुरे स्वागत को भुलाया जा सकता है!”

वह हँस पड़ा और फिर बोला:

“तुम्हें यह सबकुछ कविता में बयान करना चाहिए, विंचेंत्सो…”

रंगसाज ने सोचभरी मुस्कान के साथ उत्तर दिया:

“हाँ, लम्बी कविता के लिए यह अच्छी सामग्री है। मुझे लगता है कि मैं ऐसा कर पाऊँगा। पच्चीस बरस की उम्र पार कर लेने के बाद आदमी अच्छे प्रेम-गीत नहीं लिख पाता।”

मुरझा चुके फूल को फेंककर उसने दूसरा फूल तोड़ लिया और सभी ओर नज़र दौड़ाकर धीरे-धीरे कहता गया:

“माँ की छाती से प्रेमिका की छाती तक का रास्ता तय करने के बाद आदमी को दूसरे, नये सुख की ओर बढ़ना चाहिए…”

फिटर ने कोई राय ज़ाहिर नहीं की, गिलास में शराब को ही हिलाता रहा। अंगूर के बग़ीचों के पीछे, वहाँ नीचे, सागर धीरे-धीरे मरमर ध्वनि कर रहा था, गर्म हवा में फूलों की भीनी-भीनी सुगन्ध तैरती आ रही थी।

“यह तो सूरज ही है जो हमें इतना अधिक काहिल और नर्मदिल बना देता है,” फिटर बुदबुदाया।

“मुझसे अच्छे प्रेम-गीत नहीं रच जाते, मैं बहुत नाख़ुश हूँ अपने से,” अपनी पतली-पतली भौंहे सिकोड़कर विंचेंत्सो ने धीमी आवाज़ में कहा।

“तुमने कुछ नया रचा?”

रंगसाज ने तुरन्त उत्तर नहीं दिया और फिर बोला:

“हाँ, कल ‘कोमो’ होटल की छत पर।” और धीमी-धीमी, सोच में डूबी तथा लयबद्ध आवाज़ में सुनाने लगाः

सूना तट है, भूरी-भूरी और पुरातन चट्टानों से

शिशिर-सूर्य सस्नेह बिछुड़ता विदा ले रहा पाषाणों से,

आतुर लहरें झपट रहीं हैं काले पाषाणों पर, तट पर

स्नान कराती ये सूरज को नीले सागर में ले जाकर,

ताम्र-पात वे जिनको चंचल पतझर-पवन उड़ाकर लाया

रंग-बिरंगे मृत विहगों-सी झलके जल में उनकी छाया

शोक-व्यथित है पीला अम्बर, है उदाम उद्वेलित सागर

केवल मुस्काता है दिनकर जो विश्राम करेगा थककर।

दोनों बहुत देर तक ख़ामोश रहे, रंगसाज सिर झुकाये हुए ज़मीन को ताकता रहा, हट्टा-कट्टा और लम्बा-तड़ंगा फिटर मुस्कराया और बोलाः

“सभी चीज़ों को सुन्दर अभिव्यक्ति दी जा सकती है, किन्तु अच्छे व्यक्ति, अच्छे लोगों के बारे में सुन्दर शब्दों, सुन्दर गीतों से बढ़़कर कुछ भी नहीं!”

 

 

वह लड़का
(The Little Boy)

यह छोटी-सी कहानी सुनाना काफी कठिन होगा-इतनी सीधी-सादी है यह! जब मैं अभी छोटा ही था, तो गरमियों और वसन्त के दिनों में रविवार को, अपनी गली के बच्चों को इकट्ठा कर लेता था और उन्हें खेतों के पार, जंगल में ले जाता था। इन पंछियों की तरह चहकते, छोटे बच्चों के साथ दोस्तों की तरह रहना मुझे अच्छा लगता था।

बच्चों को भी नगर की धूल और भीड़ भरी गलियों से दूर जाना अच्छा लगता था। उनकी माँएँ उन्हें रोटियाँ दे देतीं, मैं कुछ मीठी गोलियाँ खरीद लेता, क्वास की एक बोतल भर लेता और फिर किसी गड़रिये की तरह भेड़ों के बेपरवाह मेमनों के पीछे-पीछे चलता जाता-शहर के बीच, खेतों के पार, हरे-भरे जंगल की ओर, जिसे वसन्त ने अपने सुन्दर वस्त्रों से सजा दिया होता।

आमतौर पर हम सुबह-सुबह ही शहर से बाहर निकल आते, जब कि चर्च की घण्टियाँ बज रही होतीं और बच्चों के कोमल पाँवों के जमीन पर पड़ने से धूल उठ रही होती। दोपहर के वक्त, जब दिन की गरमी अपने शिखर पर होती, तो खेलते-खेलते थककर, मेरे मित्र जंगल के एक कोने में इकट्ठे हो जाते। तब खाना खा लेने के बाद छोटे बच्चे घास पर ही सो जाते-झाड़ियों की छाँव में-जबकि बड़े बच्चे मेरे चारों ओर घिर आते और मुझे कोई कहानी सुनाने के लिए कहते। मैं कहानी सुनाने लगता और उसी तेजी से बतियाता, जिससे मेरे दोस्त और जवानी के काल्पनिक आत्मविश्वास तथा जिन्दगी के मामूली ज्ञान के हास्यास्पद गर्व के बावजूद मैं अक्सर अपने आपको विद्वानों से घिरा हुआ किसी बीस वर्षीय बच्चे-सा महसूस करता।

हमारे ऊपर अनन्त आकाश फैला है, सामने है जंगल की विविधता-एक जबरदस्त खामोशी में लिपटी हुई; हवा का कोई झोंका खड़खड़ाता हुआ पास से निकल जाता है, कोई फुसफुसाहट तेजी से गुजर जाती है, जंगल की सुवासित परछाइयाँ काँपती हैं और एक बार फिर एक अनुपम खामोशी आत्मा में भर जाती है।

आकाश के नील विस्तार में श्वेत बादल धीरे-धीरे तैर रहे हैं, सूरज की रोशनी से तपी धरती से देखने पर आसमान बेहद शीतल दिखता है और पिघलते हुए बादलों को देखकर बड़ा अजीब-सा लगता है।

और मेरे चारों ओर हैं ये छोटे-छोटे, प्यारे बच्चे, जिन्हें जिन्दगी के सभी गम और खुशियाँ जानने के लिए मैं बुला लाया हूँ।

वे थे मेरे अच्छे दिन-वे ही थीं असली दावतें, और जिन्दगी के अँधेरों से ग्रसित मेरी आत्मा, जो बच्चों के खयालों और अनुभूतियों की स्पष्ट विद्वत्ता में नहाकर तरो-ताजा हो उठती थी।

एक दिन जब बच्चों की भीड़ के साथ शहर से निकलकर मैं एक खेत में पहुँचा, तो हमें एक अजनबी मिला - एक छोटा-सा यहूदी - नंगे पाँव, फटी कमीज, काली भृकुटियाँ, दुबला शरीर और मेमने-से घुँघराले बाल। वह किसी वजह से दुखी था और लग रहा था कि वह अब तक रोता रहा है। उसकी बेजान काली आँखें सूजी हुईं और लाल थीं, जो उसके भूख से नीले पड़े चेहरे पर काफी तीखी लग रही थीं। बच्चों की भीड़ के बीच से होता हुआ, वह गली के बीचोंबीच रुक गया, उसने अपने पाँवों को सुबह की ठण्डी धूल में दृढ़ता से जमा दिया और सुघड़ चेहरे पर उसके काले ओठ भय से खुल गये - अगले क्षण, एक ही छलाँग में, वह फुटपाथ पर खड़ा था।

“उसे पकड़ लो!” सभी बच्चे एक साथ खुशी से चिल्ला उठे, “नन्हा यहूदी! नन्हे यहूदी को पकड़ लो!”

मुझे उम्मीद थी कि वह भाग खड़ा होगा। उसके दुबले, बड़ी आँखोंवाले चेहरे पर भय की मुद्रा अंकित थी। उसके ओठ काँप रहे थे। वह हँसी उड़ाने वालों की भीड़ के शोर के बीच खड़ा था। वह पाँव उठा-उठाकर अपने आपको जैसे ऊँचा बनाने को कोशिश कर रहा था। उसने अपने कन्धे राह की बाड़ पर टिका दिये थे और हाथों को पीठ के पीछे बाँध लिया था।

और तब अचानक वह बड़ी शान्त और साफ और तीखी आवाज में बोल उठा - “मैं तुम लोगों को एक खेल दिखाऊँ?”

पहले तो मैंने सोचा कि यह उसका आत्मरक्षा का कोई तरीका रहा होगा - बच्चे उसकी बात में रुचि लेने लगे और उससे दूर हट गये। केवल बड़ी उम्र के और अधिक जंगली किस्म के लड़के ही उसकी ओर शंका और अविश्वास से देखते रहे - हमारी गली के लड़के दूसरी गलियों के लड़कों से झगड़े हुए थे। उनका पक्का विश्वास था कि वे दूसरों से कहीं ज्यादा अच्छे हैं और वे दूसरों की योग्यता की ओर ध्यान देने को भी तैयार नहीं थे।

पर छोटे बच्चों के लिए यह मामला एकदम सीधा-सादा था।

“दिखाओ - जरूर दिखाओ!”

वह खूबसूरत, दुबला-पतला लड़का बाड़ से परे हट गया। उसने अपने छोटे-से शरीर को पीछे की ओर झुकाया। अपनी अँगुलियों से जमीन को छुआ और अपनी टाँगों को ऊपर की ओर उछालकर हाथों के बल खड़ा हो गया।

तब वह घूमने लगा, जैसे कोई लपट उसे झुलसा रही हो - वह अपनी बाँहों और टाँगों से खेल दिखाता रहा। उसकी कमीज और पैण्ट के छेदों में से उसके दुबले-पतले शरीर की भूरी खाल दिखाई दे रही थी - कन्धे, घुटने और कुहनियाँ तो बाहर निकले ही हुए थे। लगता था, अगर एक बार फिर झुका, तो ये पतली हड्डियाँ चटककर टूट जाएँगी। उसका पसीना चूने लगा था। पीठ पर से उसकी कमीज पूरी तरह भीग चुकी थी। हर खेल के बाद वह बच्चों की आँखों में, बनावटी, निर्जीव मुसकराहट लिये हुए, झाँककर देख लेता। उसकी चमक रहित काली आँखों का फैलना अच्छा नहीं लग रहा था - जैसे उनमें से पीड़ा झलक रही थी। वे अजीब ही ढंग से फड़फड़ाती थीं और उसकी नजर में एक ऐसा तनाव था, जो बच्चों की नजर में नहीं होता। बच्चे चिल्ला-चिल्लाकर उसे उत्साहित कर रहे थे। कई-एक तो उसकी नकल करने लगे थे।

लेकिन अचानक ये मनोरंजक क्षण खत्म हो गये। लड़का अपनी कलाबाजी छोड़कर खड़ा हो गया और किसी अनुभवी कलाकार की-सी नजर से बच्चों की ओर देखने लगा। अपना दुबला-सा हाथ आगे फैलाकर वह बोला, “अब मुझे कुछ दो!”

वे सब खामोश थे। किसी ने पूछा, “पैसे?”

“हाँ,” लड़के ने कहा।

“यह अच्छी रही! पैसे के लिए ही करना था, तो हम भी ऐसा कर सकते थे...”

लड़के हँसते हुए और गालियाँ बकते हुए खेतों की ओर दौड़ने लगे। दरअसल उनमें से किसी के पास पैसे थे भी नहीं और मेरे पास केवल सात कोपेक थे। मैंने दो सिक्के उसकी धूल भरी हथेली पर रख दिये। लड़के ने उन्हें अपनी अँगुली से छुआ और मुसकराते हुए बोला, “धन्यवाद!”

वह जाने को मुड़ा, तो मैंने देखा कि उसकी कमीज की पीठ पर काले-काले धब्बे पड़े हुए थे।

“रुको, वह क्या है?”

वह रुका, मुड़ा, उसने मेरी ओर ध्यान से देखा और बड़ी शान्त आवाज में मुस्कराते हुए बोला, “वह, पीठ पर? ईस्टर के मौके पर एक मेले में ट्रपीज करते हुए हम गिर पड़े थे - पिता अभी तक चारपाई पर पड़े हैं, पर मैं बिलकुल ठीक हूँ।”

मैंने कमीज उठाकर देखा - पीठ की खाल पर, बायें कन्धे से लेकर जाँघ तक, एक काला जख़्म का निशान फैला हुआ था, जिस पर मोटी, सख्त पपड़ी जम चुकी थी। अब खेल दिखाते समय पपड़ी फट गयी थी और वहाँ से गहरा लाल खून निकल आया था।

“अब दर्द नहीं होता,'' उसने मुस्कराते हुए कहा, ''अब दर्द नहीं होता... बस, खुजली होती है...”

और बड़ी बहादुरी से, जैसे कोई हीरो ही कर सकता है, उसने मेरी आँखों में झाँका और किसी बुजुर्ग की-सी गम्भीर आवाज में बोला, ''तुम क्या सोचते हो कि अभी मैं अपने लिए काम कर रहा था! कसम से-नहीं! मेरे पिता... हमारे पास एक पैसा तक नहीं है। और मेरे पिता बुरी तरह जख्मी हैं। इसलिए - एक को तो काम करना ही पड़ेगा, साथ ही... हम यहूदी हैं न! हर आदमी हम पर हँसता है... अच्छा अलविदा!”

वह मुस्कराते हुए, काफी खुश-खुश बात कर रहा था। और तब अपने घुँघराले बालोंवाले सिर को झटका देकर अभिवादन करते हुए वह चला गया - उन खुले दरवाजों वाले घरों के पार, जो अपनी काँच की मारक उदासीनता भरी आँखों से उसे घूर रहे थे।

ये बातें कितनी साधारण और सीधी हैं - हैं न? लेकिन अपने कठिनाई के दिनों में मैंने अक्सर उस लड़के के साहस को याद किया है - बड़ी कृतज्ञता से भर कर!

 

 

 

 

Maxim Gorky

 

Максим Горький

 

 

Мать - 1919 Первая экранизация повести М. Горького

 

Детство Горького / Childhood (1938) - биография

 

Мои университеты (1939) Полная версия

 

Дело Артамоновых / Artamonov Business, The (1941) - экранизация

 

В людях (1938) Марк Донской

 

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На дне ч.2 М.#Горький #театр #Современник #театрСовременник #ПолныеВерсииСпектаклей

 

Аудиокнига Максим Горький -Детство

 

 

 

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