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लेनिन
जीवनी

 

 

( Lenin: "On Friedrich Engels")

फ्रेडरिक एंगेल्स की स्मृति में


शरद, 1895 में लिखित।


तर्क की कैसी मशाल बुझ गयी,
कैसा हृदय हो गया स्पन्दनहीन!*

एंगेल्स का जन्म 1820 में प्रशा राज्य के राइन प्रान्त के बार्मेन नगर में हुआ था। उनके पिता कारख़ानेदार थे। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण 1838 में एंगेल्स को स्कूली शिक्षा पूरी किये बिना ही ब्रेमेन की एक व्यापारिक कम्पनी में क्लर्क की नौकरी करनी पड़ी। पर एंगेल्स की वैज्ञानिक और राजनीतिक शिक्षा जारी ही रही, उसमें व्यापारिक मामले कोई बाधा न डाल सके। जब वह स्कूल में पढ़ रहे थे, उसी समय से वह निरंकुश शासन और अधिकारियों के अत्याचारों से घृणा करने लगे थे। दर्शन का अध्ययन उन्हें और आगे ले गया। उन दिनों जर्मन दर्शन पर हेगेल का मत छाया हुआ था और एंगेल्स उनके अनुयायी बन गये। यद्यपि स्वयं हेगेल निरंकुश प्रशियाई राज्य के प्रशंसक थे और बर्लिन विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के नाते उसकी सेवा कर रहे थे, फिर भी उनका सिद्धान्त क्रान्तिकारी था। …यदि संसार की प्रत्येक वस्तु विकास करती है, यदि एक प्रकार की संस्था की जगह दूसरे प्रकार की संस्था ले लेती है, तो प्रशियाई राजा या रूसी ज़ार की निरंकुशता, विशाल बहुसंख्या को हानि पहुँचाकर नगण्य अल्पसंख्या की समृद्धि या जनता पर बुर्जुआ वर्ग का प्रभुत्व हमेशा भला क्यों बना रहेगा? …हेगेल और अन्य हेगेलवादियों के विपरीत मार्क्स और एंगेल्स भौतिकवादी थे। संसार और मानवजाति को भौतिकवादी दृष्टिकोण से देखते हुए उन्होंने अनुभव किया कि जिस प्रकार प्रकृति की सभी परिघटनाओं के मूल में भौतिक कारण रहते हैं, उसी प्रकार मानव समाज का विकास भी भौतिक शक्तियों, उत्पादक शक्तियों के विकास द्वारा निर्धारित होता है। मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपेक्षित वस्तुओं के उत्पादन में मनुष्यों के बीच जो परस्पर सम्बन्ध स्थापित होते हैं, वे उत्पादक शक्तियों के विकास पर ही निर्भर करते हैं। और इन सम्बन्धों में ही सामाजिक जीवन की सभी परिघटनाओं, मानवीय आकांक्षाओं, विचारों और नियमों की व्याख्या निहित होती है। उत्पादक शक्तियों का विकास निजी स्वामित्व पर आधारित सामाजिक सम्बन्धों को जन्म देता है, पर अब हम देखते हैं कि उत्पादक शक्तियों का यही विकास बहुसंख्या को उसके स्वामित्व से वंचित कर देता है और उसे नगण्य अल्पसंख्या के हाथों में केन्द्रित कर देता है। वह स्वामित्व को, अर्थात आधुनिक सामाजिक व्यवस्था के आधार को नष्ट कर देता है, वह स्वयं ही उसी लक्ष्य की ओर बढ़ता है, जिसे समाजवादी अपने सामने रखे हुए हैं। समाजवादियों के लिए बस यही करना रह जाता है कि वे यह समझें कि कौन सी सामाजिक शक्ति वर्तमान समाज में अपनी स्थिति के कारण समाजवाद की स्थापना में दिलचस्पी रखती है, और यह समझकर इस शक्ति को उसके हितों और उसके ऐतिहासिक मिशन की चेतना प्रदान करें। यह शक्ति है सर्वहारा वर्ग।

सर्वहारा वर्ग से एंगेल्स का परिचय इंगलैण्ड में, ब्रिटिश उद्योग के केन्द्र मानचेस्टर में हुआ, जहाँ वह एक व्यापारिक कम्पनी की नौकरी शुरू करके 1842 में बस गये थे। उनके पिता इस कम्पनी के एक हिस्सेदार थे। यहाँ एंगेल्स केवल फैक्टरी के दफ़्तर में नहीं बैठे रहे, उन्होंने उन गन्दी बस्तियों के चक्कर भी लगाये, जहाँ मज़दूर दड़बे जैसी जगहों में रहते थे। उन्होंने अपनी आँखों से उनकी दरिद्रता और दयनीय दशा देखी। पर वह केवल वैयक्तिक निरीक्षण करके ही सन्तुष्ट नहीं रहे। ब्रिटिश मज़दूर वर्ग की स्थिति के सम्बन्ध में जो भी सामग्री प्रकाश में आयी थी, उन्होंने वह सारी की सारी पढ़ डाली और जो भी सरकारी कागज़ात उपलब्ध हो सके, उन्होंने उन सब का ध्यान से अध्ययन किया। इन अध्ययनों और निरीक्षणों का फल था 1845 में प्रकाशित ‘इंगलैण्ड के मज़दूर वर्ग की दशा’ नामक पुस्तक। ‘इंगलैण्ड के मज़दूर वर्ग की दशा’ के लेखक के नाते एंगेल्स ने जो मुख्य सेवा की, उसका उल्लेख हम पहले ही कर चुके हैं। एंगेल्स के पहले भी कितने ही लोगों ने सर्वहारा वर्ग के कष्टों का वर्णन और उसकी सहायता की आवश्यकता की ओर संकेत किया था। पर एंगेल्स ही वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने कहा कि सर्वहारा न केवल कष्टग्रस्त वर्ग है पर यह कि वस्तुतः सर्वहारा की लज्जाजनक आर्थिक स्थिति ही वह चीज है, जो उसे अप्रतिरोध्य रूप से आगे बढ़ा रही है और उसे अपनी पूर्ण मुक्ति के लिए लड़ने को विवश कर रही है। और संघर्षरत सर्वहारा स्वयं अपनी सहायता कर लेगा। मज़दूर वर्ग का राजनीतिक आन्दोलन अनिवार्य रूप से मज़दूरों को यह अनुभव करायेगा कि उनकी मुक्ति का एकमात्र मार्ग समाजवाद है। दूसरी ओर, समाजवाद तभी एक शक्ति बनेगा, जब वह मज़दूर वर्ग के राजनीतिक संघर्ष का उद्देश्य बन जायेगा। ये हैं इंगलैण्ड के मज़दूर वर्ग की स्थिति से सम्बन्धित एंगेल्स की पुस्तक के मुख्य विचार। ये विचार अब सभी विचारशील और संघर्षरत सर्वहाराओं ने अपना लिये हैं, पर उस समय वे बिल्कुल नये थे। इन विचारों का प्रकाशन एक ऐसी पुस्तक में हुआ, जो हृदयग्राही शैली में लिखी हुई थी, और ब्रिटिश सर्वहारा की दयनीय दशा के अत्यन्त प्रामाणिक और स्तम्भित कर देने वाले चित्रों से भरपूर थी। इस पुस्तक ने पूँजीवाद और बुर्जुआ वर्ग को भयानक अपराधी करार दिया और लोगों पर गहरा असर डाला। आधुनिक सर्वहारा की स्थिति का सर्वोत्तम चित्र प्रस्तुत करने वाली पुस्तक के रूप में एंगेल्स की इस रचना का सर्वत्र हवाला दिया जाने लगा। और वस्तुतः न 1845 के पहले और न उसके बाद ही मज़दूर वर्ग की दयनीय दशा का इतना प्रभावोत्पादक और सत्यदर्शी चित्र और कहीं प्रस्तुत हो पाया है।

इंगलैण्ड में आ बसने के बाद ही एंगेल्स समाजवादी बने। मानचेस्टर में उन्होंने उस समय के ब्रिटिश मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने वाले लोगों से सम्पर्क स्थापित किया और ब्रिटिश समाजवादी प्रकाशनों के लिए लेख लिखना आरम्भ किया। 1844 में जर्मनी लौटते समय पेरिस में मार्क्स से उनका परिचय हुआ। मार्क्स के साथ उनका पत्र-व्यवहार इससे पहले ही शुरू हो चुका था। पेरिस में फ्रांसीसी समाजवादियों और फ्रांसीसी जीवन के प्रभाव से मार्क्स भी समाजवादी बन गये थे। यहाँ दोनों मित्रों ने मिलकर एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक है ‘पवित्र परिवार या आलोचनात्मक आलोचना की आलोचना’। यह पुस्तक ‘इंगलैण्ड के मज़दूर वर्ग की दशा’ से एक वर्ष पहले प्रकाशित हुई और इसका अधिकांश मार्क्स ने लिखा। ऊपर जिस क्रान्तिकारी-भौतिकवादी समाजवाद के मुख्य विचारों की व्याख्या हम कर चुके हैं, उसके आधारभूत सिद्धान्त इस पुस्तक में प्रस्तुत किये गये हैं। …‘पवित्र परिवार’ के प्रकाशित होने से पहले ही एंगेल्स ने मार्क्स और रूगे की ‘जर्मन-फ्रांसीसी पत्रिका’ में अपनी रचना ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र पर आलोचनात्मक निबन्ध’ प्रकाशित की थी, जिसमें उन्होंने समाजवादी दृष्टिकोण से समकालीन आर्थिक व्यवस्था की प्रधान परिघटनाओं को जाँचा-परखा और यह निष्कर्ष निकाला कि वे निजी स्वामित्व के प्रभुत्व के अनिवार्य परिणाम हैं। मार्क्स ने राजनीतिक अर्थशास्त्र का अध्ययन करने का जो निश्चय किया, उसमें निस्सन्देह एंगेल्स के साथ उनका सम्पर्क एक कारक था। इस विज्ञान के क्षेत्र में मार्क्स की रचनाओं ने वस्तुतः क्रान्ति कर दी।

1845 से 1847 तक एंगेल्स ब्रसेल्स और पेरिस में रहे और वैज्ञानिक कार्य के साथ-साथ उन्होंने ब्रसेल्स और पेरिस के जर्मन मज़दूरों के बीच अमली कार्रवाइयाँ भी कीं। यहाँ मार्क्स और एंगेल्स ने गुप्त जर्मन ‘कम्युनिस्ट लीग’ के साथ सम्पर्क स्थापित किया और लीग ने उन्हें उनके द्वारा निरूपित समाजवाद के मुख्य सिद्धान्तों की व्याख्या करने का कार्य सौंप दिया। इस प्रकार मार्क्स और एंगेल्स की प्रसिद्ध रचना ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ का जन्म हुआ। यह 1848 में प्रकाशित हुआ। इस छोटी-सी पुस्तिका का मूल्य अनेकानेक ग्रन्थों के बराबर है: आज भी उसकी जीवन्त भाव-धारा समूचे सभ्य संसार के संगठित और संघर्षरत सर्वहारा को स्फूर्ति और प्रेरणा प्रदान करती है। 1848 की क्रान्ति से, जो पहले फ्रांस में भड़की और फिर पश्चिमी यूरोप के अन्य देशों में फैल गयी, प्रेरित होकर मार्क्स और एंगेल्स फिर अपनी मातृभूमि वापस आये। यहाँ, राइनी प्रशा में उन्होंने कोलोन से प्रकाशित होने वाले जनवादी ‘नया राइनी समाचारपत्र’ की बागडोर अपने हाथों में ली। ये दोनों मित्र राइनी प्रशा की सारी क्रान्तिकारी-जनवादी आकांक्षाओं का केन्द्र और स्रोत थे। जनता के हितों और स्वंतत्रता की रक्षा में उन्होंने आखिरी सम्भावना तक प्रतिक्रियावादी शक्तियों से लोहा लिया। जैसा कि हम जानते हैं, प्रतिक्रियावादी शक्तियों का पलड़ा भारी पड़ा। ‘नया राइनी समाचारपत्र’ का गला घोंट दिया गया। मार्क्स को, जो पिछले उत्प्रवासन-काल में अपनी प्रशियाई नागरिकता खो चुके थे, प्रशा से निर्वासित कर दिया गया; एंगेल्स ने सशस्त्र जन-विद्रोह में भाग लिया, स्वतन्त्रता के लिए तीन लड़ाइयों में हिस्सा लिया और विद्रोहियों की पराजय के बाद वह स्विट्ज़रलैण्ड के रास्ते होते हुए लन्दन पहुँच गये।

मार्क्स भी लन्दन में ही बस गये। एंगेल्स फिर एक बार मानचेस्टर की उसी कम्पनी में क्लर्क बन गये, जहाँ वह 19वीं शताब्दी के पाँचवें दशक में काम करते थे। बाद में वह उस कम्पनी के हिस्सेदार बने। 1870 तक वह मानचेस्टर में रहे, जबकि मार्क्स लन्दन में रहते थे। फिर भी इससे उनके अत्यन्त स्फूर्तिप्रद विचार-विनिमय के जारी रहने में कोई बाधा न आयी: लगभग हर रोज उनकी चिट्ठी-पत्री चलती थी। इस पत्र-व्यवहार द्वारा इन दो मित्रों ने विचारों एवं खोजों का आदान-प्रदान किया और वैज्ञानिक समाजवाद की रचना में सहयोग जारी रखा। 1870 में एंगेल्स लन्दन चले गये और वहाँ उनका संयुक्त बौद्धिक जीवन-कठिन साधना का जीवन-1883 तक, अर्थात मार्क्स के देहान्त तक चलता रहा। इस साधना का फल मार्क्स की ओर से ‘पूँजी’ रहा, जो राजनीतिक अर्थशास्त्र पर हमारे युग की सबसे महान रचना है, और एंगेल्स की ओर से कितनी ही छोटी और बड़ी रचनाएँ। मार्क्स ने पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की जटिल परिघटनाओं के विश्लेषण पर काम किया। एंगेल्स ने सरल भाषा में लिखित और अक्सर वाद-विवाद शैली की अपनी रचनाओं में सामान्य वैज्ञानिक समस्याओं और अतीत तथा वर्तमान की विविध परिघटनाओं का विवेचन इतिहास की भौतिकवादी धारणा और मार्क्स के आर्थिक सिद्धान्त के प्रकाश में किया। एंगेल्स की इन रचनाओं में से हम निम्नलिखित रचनाओं का उल्लेख करेंगे: ड्यूहरिंग के विरुद्ध खण्डन-मण्डनात्मक रचना (जिसमें दर्शन, प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र की अत्यन्त महत्वपूर्ण समस्याओं का विश्लेषण किया गया है), ‘परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति’…, ‘लुडविग फायरबाख’…, आवास की समस्या पर उत्कृष्ट लेख और अन्त में, रूस के आर्थिक विकास के सम्बन्ध में दो छोटे, पर अतिमूल्यवान लेख। ‘पूँजी’ से सम्बन्धित विशाल काम पूरा होने से पहले ही मार्क्स का देहान्त हो गया। फिर भी पुस्तक अपने मूल रूप में तैयार हो चुकी थी। अपने मित्र की मृत्यु के बाद एंगेल्स ने ‘पूँजी’ के दूसरे और तीसरे खण्डों की प्रकाशनार्थ तैयारी और प्रकाशन का भारी काम अपने कन्धों पर लिया। उन्होंने दूसरा खण्ड 1885 में और तीसरा खण्ड 1894 में प्रकाशित किया (उनकी मृत्यु के कारण चौथे खण्ड की तैयारी में बाधा पड़ी)। उक्त दो खण्डों के प्रकाशन की तैयारी का काम बहुत ही परिश्रमसाध्य था। आस्ट्रियाई सामाजिक-जनवादी एडलर ने ठीक ही कहा है कि ‘पूँजी’ के दूसरे और तीसरे खण्डों के प्रकाशन द्वारा एंगेल्स ने अपने प्रतिभाशाली मित्र का भव्य स्मारक खड़ा किया, एक ऐसा स्मारक, जिस पर न चाहते हुए भी उन्होंने अपना नाम अमिट रूप से अंकित कर दिया। वस्तुतः ‘पूँजी’ के ये दो खण्ड दो व्यक्तियों-मार्क्स और एंगेल्स-की कृति हैं। प्राचीन गाथाओं में मैत्री के कितने ही हृदयस्पर्शी उदाहरण मिलते हैं। यूरोपीय सर्वहारा कह सकता है कि उसके विज्ञान की रचना दो ऐसे विद्वानों और योद्धाओं ने की, जिनके पारस्परिक सम्बन्धों के आगे मानवीय मैत्री की अत्यन्त हृदयस्पर्शी पुराण-कथाएँ भी फीकी पड़ जाती हैं। एंगेल्स सदा ही-और आम तौर पर उचित ही-अपने को मार्क्स के बाद रखते थे। “मार्क्स के जीवन-काल में,” उन्होंने अपने एक पुराने मित्र को लिखा था, “मैंने गौण भूमिका अदा की।” जीवित मार्क्स के प्रति उनका प्रेम और मृत मार्क्स की स्मृति के प्रति उनका आदर असीम था। इस दृढ़ योद्धा और कठोर विचारक का हृदय गहरे प्रेम से परिपूर्ण था।

1848-1849 के आन्दोलन के बाद निर्वासन-काल में मार्क्स और एंगेल्स केवल वैज्ञानिक शोधकार्य में ही व्यस्त नहीं रहे। 1864 में मार्क्स ने ‘अन्तर्राष्ट्रीय मज़दूर संघ’ की स्थापना की और पूरे दशक भर इस संस्था का नेतृत्व किया। एंगेल्स ने भी इस संस्था के कार्य में सक्रिय भाग लिया। ‘अन्तर्राष्ट्रीय संघ’ का कार्य, जिसने मार्क्स के विचारानुसार सभी देशों के सर्वहारा को एकजुट किया, मज़दूर आन्दोलन के विकास के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण था। पर 19वीं शताब्दी के आठवें दशक में उक्त संघ के बन्द होने के बाद भी मार्क्स और एंगेल्स की एकजुटता विषयक भूमिका नहीं समाप्त हुई। इसके विपरीत, कहा जा सकता है, मज़दूर आन्दोलन के वैचारिक नेताओं के रूप में उनका महत्व सतत बढ़ता रहा, क्योंकि यह आन्दोलन स्वयं भी अरोध्य रूप से प्रगति करता रहा। मार्क्स की मृत्यु के बाद अकेले एंगेल्स यूरोपीय समाजवादियों के परामर्शदाता और नेता बने रहे। उनका परामर्श और मार्गदर्शन जर्मन समाजवादी, जिनकी शक्ति सरकारी यन्त्रणाओं के बावजूद शीघ्रता से और सतत बढ़ रही थी, और स्पेन, रूमानिया, रूस आदि जैसे पिछड़े देशों के प्रतिनिधि, जो अपने पहले कदम बहुत सोच-विचार कर और सम्भल कर रखने को विवश थे, सभी समान रूप से चाहते थे। वे सब वृद्ध एंगेल्स के ज्ञान और अनुभव के समृद्ध भण्डार से लाभ उठाते थे।

… “सर्वहारा की मुक्ति स्वयं सर्वहारा के हाथों सम्पन्न हो सकती है,” मार्क्स और एंगेल्स बराबर यही सीख देते रहे। पर अपनी आर्थिक मुक्ति के लिए संघर्ष करने के लिए यह जरूरी है कि सर्वहारा कुछ राजनीतिक अधिकार प्राप्त करे। …

सर्वहारा के महान योद्धा और शिक्षक फ्रेडरिक एंगेल्स की स्मृति हमेशा अमर रहे।

 

 

 

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*(रूसी कवि नेक्रासोव की प्रसिद्ध पंक्तियाँ जो महान लेखक दोब्रोल्युबोव के निधन पर लिखी गयी थीं)

 

 

 

लेनिन (1895) (On Strikes 1899)

फ्रेडरिक एंगेल्स की स्मृति में

शरद, 1895 में लिखित।

 

 

तर्क की कैसी मशाल बुझ गयी,
कैसा हृदय हो गया स्पन्दनहीन!*

एंगेल्स का जन्म 1820 में प्रशा राज्य के राइन प्रान्त के बार्मेन नगर में हुआ था। उनके पिता कारख़ानेदार थे। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण 1838 में एंगेल्स को स्कूली शिक्षा पूरी किये बिना ही ब्रेमेन की एक व्यापारिक कम्पनी में क्लर्क की नौकरी करनी पड़ी। पर एंगेल्स की वैज्ञानिक और राजनीतिक शिक्षा जारी ही रही, उसमें व्यापारिक मामले कोई बाधा न डाल सके। जब वह स्कूल में पढ़ रहे थे, उसी समय से वह निरंकुश शासन और अधिकारियों के अत्याचारों से घृणा करने लगे थे। दर्शन का अध्ययन उन्हें और आगे ले गया। उन दिनों जर्मन दर्शन पर हेगेल का मत छाया हुआ था और एंगेल्स उनके अनुयायी बन गये। यद्यपि स्वयं हेगेल निरंकुश प्रशियाई राज्य के प्रशंसक थे और बर्लिन विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के नाते उसकी सेवा कर रहे थे, फिर भी उनका सिद्धान्त क्रान्तिकारी था। …यदि संसार की प्रत्येक वस्तु विकास करती है, यदि एक प्रकार की संस्था की जगह दूसरे प्रकार की संस्था ले लेती है, तो प्रशियाई राजा या रूसी ज़ार की निरंकुशता, विशाल बहुसंख्या को हानि पहुँचाकर नगण्य अल्पसंख्या की समृद्धि या जनता पर बुर्जुआ वर्ग का प्रभुत्व हमेशा भला क्यों बना रहेगा? …हेगेल और अन्य हेगेलवादियों के विपरीत मार्क्स और एंगेल्स भौतिकवादी थे। संसार और मानवजाति को भौतिकवादी दृष्टिकोण से देखते हुए उन्होंने अनुभव किया कि जिस प्रकार प्रकृति की सभी परिघटनाओं के मूल में भौतिक कारण रहते हैं, उसी प्रकार मानव समाज का विकास भी भौतिक शक्तियों, उत्पादक शक्तियों के विकास द्वारा निर्धारित होता है। मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपेक्षित वस्तुओं के उत्पादन में मनुष्यों के बीच जो परस्पर सम्बन्ध स्थापित होते हैं, वे उत्पादक शक्तियों के विकास पर ही निर्भर करते हैं। और इन सम्बन्धों में ही सामाजिक जीवन की सभी परिघटनाओं, मानवीय आकांक्षाओं, विचारों और नियमों की व्याख्या निहित होती है। उत्पादक शक्तियों का विकास निजी स्वामित्व पर आधारित सामाजिक सम्बन्धों को जन्म देता है, पर अब हम देखते हैं कि उत्पादक शक्तियों का यही विकास बहुसंख्या को उसके स्वामित्व से वंचित कर देता है और उसे नगण्य अल्पसंख्या के हाथों में केन्द्रित कर देता है। वह स्वामित्व को, अर्थात आधुनिक सामाजिक व्यवस्था के आधार को नष्ट कर देता है, वह स्वयं ही उसी लक्ष्य की ओर बढ़ता है, जिसे समाजवादी अपने सामने रखे हुए हैं। समाजवादियों के लिए बस यही करना रह जाता है कि वे यह समझें कि कौन सी सामाजिक शक्ति वर्तमान समाज में अपनी स्थिति के कारण समाजवाद की स्थापना में दिलचस्पी रखती है, और यह समझकर इस शक्ति को उसके हितों और उसके ऐतिहासिक मिशन की चेतना प्रदान करें। यह शक्ति है सर्वहारा वर्ग।

सर्वहारा वर्ग से एंगेल्स का परिचय इंगलैण्ड में, ब्रिटिश उद्योग के केन्द्र मानचेस्टर में हुआ, जहाँ वह एक व्यापारिक कम्पनी की नौकरी शुरू करके 1842 में बस गये थे। उनके पिता इस कम्पनी के एक हिस्सेदार थे। यहाँ एंगेल्स केवल फैक्टरी के दफ़्तर में नहीं बैठे रहे, उन्होंने उन गन्दी बस्तियों के चक्कर भी लगाये, जहाँ मज़दूर दड़बे जैसी जगहों में रहते थे। उन्होंने अपनी आँखों से उनकी दरिद्रता और दयनीय दशा देखी। पर वह केवल वैयक्तिक निरीक्षण करके ही सन्तुष्ट नहीं रहे। ब्रिटिश मज़दूर वर्ग की स्थिति के सम्बन्ध में जो भी सामग्री प्रकाश में आयी थी, उन्होंने वह सारी की सारी पढ़ डाली और जो भी सरकारी कागज़ात उपलब्ध हो सके, उन्होंने उन सब का ध्यान से अध्ययन किया। इन अध्ययनों और निरीक्षणों का फल था 1845 में प्रकाशित ‘इंगलैण्ड के मज़दूर वर्ग की दशा’ नामक पुस्तक। ‘इंगलैण्ड के मज़दूर वर्ग की दशा’ के लेखक के नाते एंगेल्स ने जो मुख्य सेवा की, उसका उल्लेख हम पहले ही कर चुके हैं। एंगेल्स के पहले भी कितने ही लोगों ने सर्वहारा वर्ग के कष्टों का वर्णन और उसकी सहायता की आवश्यकता की ओर संकेत किया था। पर एंगेल्स ही वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने कहा कि सर्वहारा न केवल कष्टग्रस्त वर्ग है पर यह कि वस्तुतः सर्वहारा की लज्जाजनक आर्थिक स्थिति ही वह चीज है, जो उसे अप्रतिरोध्य रूप से आगे बढ़ा रही है और उसे अपनी पूर्ण मुक्ति के लिए लड़ने को विवश कर रही है। और संघर्षरत सर्वहारा स्वयं अपनी सहायता कर लेगा। मज़दूर वर्ग का राजनीतिक आन्दोलन अनिवार्य रूप से मज़दूरों को यह अनुभव करायेगा कि उनकी मुक्ति का एकमात्र मार्ग समाजवाद है। दूसरी ओर, समाजवाद तभी एक शक्ति बनेगा, जब वह मज़दूर वर्ग के राजनीतिक संघर्ष का उद्देश्य बन जायेगा। ये हैं इंगलैण्ड के मज़दूर वर्ग की स्थिति से सम्बन्धित एंगेल्स की पुस्तक के मुख्य विचार। ये विचार अब सभी विचारशील और संघर्षरत सर्वहाराओं ने अपना लिये हैं, पर उस समय वे बिल्कुल नये थे। इन विचारों का प्रकाशन एक ऐसी पुस्तक में हुआ, जो हृदयग्राही शैली में लिखी हुई थी, और ब्रिटिश सर्वहारा की दयनीय दशा के अत्यन्त प्रामाणिक और स्तम्भित कर देने वाले चित्रों से भरपूर थी। इस पुस्तक ने पूँजीवाद और बुर्जुआ वर्ग को भयानक अपराधी करार दिया और लोगों पर गहरा असर डाला। आधुनिक सर्वहारा की स्थिति का सर्वोत्तम चित्र प्रस्तुत करने वाली पुस्तक के रूप में एंगेल्स की इस रचना का सर्वत्र हवाला दिया जाने लगा। और वस्तुतः न 1845 के पहले और न उसके बाद ही मज़दूर वर्ग की दयनीय दशा का इतना प्रभावोत्पादक और सत्यदर्शी चित्र और कहीं प्रस्तुत हो पाया है।

इंगलैण्ड में आ बसने के बाद ही एंगेल्स समाजवादी बने। मानचेस्टर में उन्होंने उस समय के ब्रिटिश मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने वाले लोगों से सम्पर्क स्थापित किया और ब्रिटिश समाजवादी प्रकाशनों के लिए लेख लिखना आरम्भ किया। 1844 में जर्मनी लौटते समय पेरिस में मार्क्स से उनका परिचय हुआ। मार्क्स के साथ उनका पत्र-व्यवहार इससे पहले ही शुरू हो चुका था। पेरिस में फ्रांसीसी समाजवादियों और फ्रांसीसी जीवन के प्रभाव से मार्क्स भी समाजवादी बन गये थे। यहाँ दोनों मित्रों ने मिलकर एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक है ‘पवित्र परिवार या आलोचनात्मक आलोचना की आलोचना’। यह पुस्तक ‘इंगलैण्ड के मज़दूर वर्ग की दशा’ से एक वर्ष पहले प्रकाशित हुई और इसका अधिकांश मार्क्स ने लिखा। ऊपर जिस क्रान्तिकारी-भौतिकवादी समाजवाद के मुख्य विचारों की व्याख्या हम कर चुके हैं, उसके आधारभूत सिद्धान्त इस पुस्तक में प्रस्तुत किये गये हैं। …‘पवित्र परिवार’ के प्रकाशित होने से पहले ही एंगेल्स ने मार्क्स और रूगे की ‘जर्मन-फ्रांसीसी पत्रिका’ में अपनी रचना ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र पर आलोचनात्मक निबन्ध’ प्रकाशित की थी, जिसमें उन्होंने समाजवादी दृष्टिकोण से समकालीन आर्थिक व्यवस्था की प्रधान परिघटनाओं को जाँचा-परखा और यह निष्कर्ष निकाला कि वे निजी स्वामित्व के प्रभुत्व के अनिवार्य परिणाम हैं। मार्क्स ने राजनीतिक अर्थशास्त्र का अध्ययन करने का जो निश्चय किया, उसमें निस्सन्देह एंगेल्स के साथ उनका सम्पर्क एक कारक था। इस विज्ञान के क्षेत्र में मार्क्स की रचनाओं ने वस्तुतः क्रान्ति कर दी।

1845 से 1847 तक एंगेल्स ब्रसेल्स और पेरिस में रहे और वैज्ञानिक कार्य के साथ-साथ उन्होंने ब्रसेल्स और पेरिस के जर्मन मज़दूरों के बीच अमली कार्रवाइयाँ भी कीं। यहाँ मार्क्स और एंगेल्स ने गुप्त जर्मन ‘कम्युनिस्ट लीग’ के साथ सम्पर्क स्थापित किया और लीग ने उन्हें उनके द्वारा निरूपित समाजवाद के मुख्य सिद्धान्तों की व्याख्या करने का कार्य सौंप दिया। इस प्रकार मार्क्स और एंगेल्स की प्रसिद्ध रचना ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ का जन्म हुआ। यह 1848 में प्रकाशित हुआ। इस छोटी-सी पुस्तिका का मूल्य अनेकानेक ग्रन्थों के बराबर है: आज भी उसकी जीवन्त भाव-धारा समूचे सभ्य संसार के संगठित और संघर्षरत सर्वहारा को स्फूर्ति और प्रेरणा प्रदान करती है। 1848 की क्रान्ति से, जो पहले फ्रांस में भड़की और फिर पश्चिमी यूरोप के अन्य देशों में फैल गयी, प्रेरित होकर मार्क्स और एंगेल्स फिर अपनी मातृभूमि वापस आये। यहाँ, राइनी प्रशा में उन्होंने कोलोन से प्रकाशित होने वाले जनवादी ‘नया राइनी समाचारपत्र’ की बागडोर अपने हाथों में ली। ये दोनों मित्र राइनी प्रशा की सारी क्रान्तिकारी-जनवादी आकांक्षाओं का केन्द्र और स्रोत थे। जनता के हितों और स्वंतत्रता की रक्षा में उन्होंने आखिरी सम्भावना तक प्रतिक्रियावादी शक्तियों से लोहा लिया। जैसा कि हम जानते हैं, प्रतिक्रियावादी शक्तियों का पलड़ा भारी पड़ा। ‘नया राइनी समाचारपत्र’ का गला घोंट दिया गया। मार्क्स को, जो पिछले उत्प्रवासन-काल में अपनी प्रशियाई नागरिकता खो चुके थे, प्रशा से निर्वासित कर दिया गया; एंगेल्स ने सशस्त्र जन-विद्रोह में भाग लिया, स्वतन्त्रता के लिए तीन लड़ाइयों में हिस्सा लिया और विद्रोहियों की पराजय के बाद वह स्विट्ज़रलैण्ड के रास्ते होते हुए लन्दन पहुँच गये।

मार्क्स भी लन्दन में ही बस गये। एंगेल्स फिर एक बार मानचेस्टर की उसी कम्पनी में क्लर्क बन गये, जहाँ वह 19वीं शताब्दी के पाँचवें दशक में काम करते थे। बाद में वह उस कम्पनी के हिस्सेदार बने। 1870 तक वह मानचेस्टर में रहे, जबकि मार्क्स लन्दन में रहते थे। फिर भी इससे उनके अत्यन्त स्फूर्तिप्रद विचार-विनिमय के जारी रहने में कोई बाधा न आयी: लगभग हर रोज उनकी चिट्ठी-पत्री चलती थी। इस पत्र-व्यवहार द्वारा इन दो मित्रों ने विचारों एवं खोजों का आदान-प्रदान किया और वैज्ञानिक समाजवाद की रचना में सहयोग जारी रखा। 1870 में एंगेल्स लन्दन चले गये और वहाँ उनका संयुक्त बौद्धिक जीवन-कठिन साधना का जीवन-1883 तक, अर्थात मार्क्स के देहान्त तक चलता रहा। इस साधना का फल मार्क्स की ओर से ‘पूँजी’ रहा, जो राजनीतिक अर्थशास्त्र पर हमारे युग की सबसे महान रचना है, और एंगेल्स की ओर से कितनी ही छोटी और बड़ी रचनाएँ। मार्क्स ने पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की जटिल परिघटनाओं के विश्लेषण पर काम किया। एंगेल्स ने सरल भाषा में लिखित और अक्सर वाद-विवाद शैली की अपनी रचनाओं में सामान्य वैज्ञानिक समस्याओं और अतीत तथा वर्तमान की विविध परिघटनाओं का विवेचन इतिहास की भौतिकवादी धारणा और मार्क्स के आर्थिक सिद्धान्त के प्रकाश में किया। एंगेल्स की इन रचनाओं में से हम निम्नलिखित रचनाओं का उल्लेख करेंगे: ड्यूहरिंग के विरुद्ध खण्डन-मण्डनात्मक रचना (जिसमें दर्शन, प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र की अत्यन्त महत्वपूर्ण समस्याओं का विश्लेषण किया गया है), ‘परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति’…, ‘लुडविग फायरबाख’…, आवास की समस्या पर उत्कृष्ट लेख और अन्त में, रूस के आर्थिक विकास के सम्बन्ध में दो छोटे, पर अतिमूल्यवान लेख। ‘पूँजी’ से सम्बन्धित विशाल काम पूरा होने से पहले ही मार्क्स का देहान्त हो गया। फिर भी पुस्तक अपने मूल रूप में तैयार हो चुकी थी। अपने मित्र की मृत्यु के बाद एंगेल्स ने ‘पूँजी’ के दूसरे और तीसरे खण्डों की प्रकाशनार्थ तैयारी और प्रकाशन का भारी काम अपने कन्धों पर लिया। उन्होंने दूसरा खण्ड 1885 में और तीसरा खण्ड 1894 में प्रकाशित किया (उनकी मृत्यु के कारण चौथे खण्ड की तैयारी में बाधा पड़ी)। उक्त दो खण्डों के प्रकाशन की तैयारी का काम बहुत ही परिश्रमसाध्य था। आस्ट्रियाई सामाजिक-जनवादी एडलर ने ठीक ही कहा है कि ‘पूँजी’ के दूसरे और तीसरे खण्डों के प्रकाशन द्वारा एंगेल्स ने अपने प्रतिभाशाली मित्र का भव्य स्मारक खड़ा किया, एक ऐसा स्मारक, जिस पर न चाहते हुए भी उन्होंने अपना नाम अमिट रूप से अंकित कर दिया। वस्तुतः ‘पूँजी’ के ये दो खण्ड दो व्यक्तियों-मार्क्स और एंगेल्स-की कृति हैं। प्राचीन गाथाओं में मैत्री के कितने ही हृदयस्पर्शी उदाहरण मिलते हैं। यूरोपीय सर्वहारा कह सकता है कि उसके विज्ञान की रचना दो ऐसे विद्वानों और योद्धाओं ने की, जिनके पारस्परिक सम्बन्धों के आगे मानवीय मैत्री की अत्यन्त हृदयस्पर्शी पुराण-कथाएँ भी फीकी पड़ जाती हैं। एंगेल्स सदा ही-और आम तौर पर उचित ही-अपने को मार्क्स के बाद रखते थे। “मार्क्स के जीवन-काल में,” उन्होंने अपने एक पुराने मित्र को लिखा था, “मैंने गौण भूमिका अदा की।” जीवित मार्क्स के प्रति उनका प्रेम और मृत मार्क्स की स्मृति के प्रति उनका आदर असीम था। इस दृढ़ योद्धा और कठोर विचारक का हृदय गहरे प्रेम से परिपूर्ण था।

1848-1849 के आन्दोलन के बाद निर्वासन-काल में मार्क्स और एंगेल्स केवल वैज्ञानिक शोधकार्य में ही व्यस्त नहीं रहे। 1864 में मार्क्स ने ‘अन्तर्राष्ट्रीय मज़दूर संघ’ की स्थापना की और पूरे दशक भर इस संस्था का नेतृत्व किया। एंगेल्स ने भी इस संस्था के कार्य में सक्रिय भाग लिया। ‘अन्तर्राष्ट्रीय संघ’ का कार्य, जिसने मार्क्स के विचारानुसार सभी देशों के सर्वहारा को एकजुट किया, मज़दूर आन्दोलन के विकास के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण था। पर 19वीं शताब्दी के आठवें दशक में उक्त संघ के बन्द होने के बाद भी मार्क्स और एंगेल्स की एकजुटता विषयक भूमिका नहीं समाप्त हुई। इसके विपरीत, कहा जा सकता है, मज़दूर आन्दोलन के वैचारिक नेताओं के रूप में उनका महत्व सतत बढ़ता रहा, क्योंकि यह आन्दोलन स्वयं भी अरोध्य रूप से प्रगति करता रहा। मार्क्स की मृत्यु के बाद अकेले एंगेल्स यूरोपीय समाजवादियों के परामर्शदाता और नेता बने रहे। उनका परामर्श और मार्गदर्शन जर्मन समाजवादी, जिनकी शक्ति सरकारी यन्त्रणाओं के बावजूद शीघ्रता से और सतत बढ़ रही थी, और स्पेन, रूमानिया, रूस आदि जैसे पिछड़े देशों के प्रतिनिधि, जो अपने पहले कदम बहुत सोच-विचार कर और सम्भल कर रखने को विवश थे, सभी समान रूप से चाहते थे। वे सब वृद्ध एंगेल्स के ज्ञान और अनुभव के समृद्ध भण्डार से लाभ उठाते थे।

… “सर्वहारा की मुक्ति स्वयं सर्वहारा के हाथों सम्पन्न हो सकती है,” मार्क्स और एंगेल्स बराबर यही सीख देते रहे। पर अपनी आर्थिक मुक्ति के लिए संघर्ष करने के लिए यह जरूरी है कि सर्वहारा कुछ राजनीतिक अधिकार प्राप्त करे। …

सर्वहारा के महान योद्धा और शिक्षक फ्रेडरिक एंगेल्स की स्मृति हमेशा अमर रहे।


*(रूसी कवि नेक्रासोव की प्रसिद्ध पंक्तियाँ जो महान लेखक दोब्रोल्युबोव के निधन पर लिखी गयी थीं)

 

 

 

 

लेनिन (1902)

क्या करें?

क्या करें,किताब का अंश

 

 

अ. आलोचना की स्वतंत्रता के मायने क्या हैं?

'आलोचना की स्वतंत्रता' निस्संदेह मौजूदा समय का सबसे फैशनेबल नारा है। यह सभी देशों और समाजवादियों और जनवादियों के बीच चल रहे विवादों में सर्वाधिक इस्तेमाल किया जाने वाला मुद्दा है। विवाद में शामिल पार्टियों में से कोई एक अगर आलोचना की स्वतंत्रता के लिए गंभीर अपील करे तो पहली नजर में इससे ज्यादा विचित्र बात कोई और नजर नहीं आएगी। बहुतेरे यूरोपीय देशों के संवैधानिक कानून, विज्ञान और वैज्ञानिक अन्वेषणों के लिए स्वतंत्रता की गारंटी करते हैं। क्या इन कानूनों के खिलाफ इन देशों की अग्रणी पार्टियों के भीतर आवाज उठाई गई है? 'यहां कुछ न कुछ गलत निश्चित रूप से है।' यही किसी भी उस दर्शक की टिप्पणी होगी, जिसने आलोचना की स्वतंत्रता के इस फैशनेबल नारे को सुना होगा। इस नारे को बार-बार दोहराया तो जाता रहा है, लेकिन उसके प्रति उठे विवादों के सारतत्व को भेदा नहीं जा सकता है। 'बिलकुल साफ है कि यह नारा एक पारंपरिक शब्द-खंड या उक्ति है, जो संक्षिप्त नामों की तरह इस्तेमाल के क्रम में वैधानिक और लगभग जातीय (एक वर्ग-विशेष का) पद हो गया है।'

वास्तव में यह किसी के लिए रहस्य नहीं है कि दो प्रवृत्तियों ने मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक लोकतंत्र में अपने स्वरूप ले लिए हैं। इनके बीच संघर्ष अब ज्वलंत रूप ले चुका है और यह संघर्ष 'विराम संधि प्रस्ताव' की राख के नीचे सुलग रहा है। 'नई' प्रवृत्ति का सारतत्व है 'पुरातन कट्टरपंथी' मार्क्सवाद के प्रति आलोचनात्मक रुख अख्तियार करना। जाहिर है कि इसे बर्नस्टीन द्वारा पेश किया गया है और इसे मिलेरां ने प्रदर्शित किया है।

सामाजिक जनवाद को सामाजिक क्रांति के लिए समर्पित पार्टी से परिवर्तित होकर सामाजिक सुधारों की जनवादी पार्टी हो जाना चाहिए। बर्नस्टीन इस राजनीतिक मांग को समग्र रूप से नए विचारों और तर्कों से लैस करते हैं। समाजवाद को वैज्ञानिक आधार देने और इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा के नजरिए से इसकी जरूरत को दरशाने की अपरिहार्यता को नकारा गया। बढ़ती दरिद्रता, सर्वहारापन की प्रक्रिया और पूंजीवादी अंतर्विरोध की तीव्रता जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों को नकारा गया। अंतिम लक्ष्य जैसी अवधारणा को अपरिपक्व घोषित किया गया और सर्वहारा के अधिनायकत्व के विचार को पूरी तरह से खारिज किया गया। उदारवाद और समाजवाद के बीच एंटी-थीसिस को सिध्दांतत: नकारा गया। वर्ग संघर्ष के सिध्दांत को इस गलत आधार पर नकारा गया कि बहुमत की इच्छाओं के अनुरूप शासित होने वाले लोकतांत्रिक समाज में या तो यह व्यावहारिक ही नहीं है या फिर बेईमानी है। आदि ... इत्यादि।

आखिरकार क्रांतिकारी सामाजिक लोकतंत्र से बुर्जुआ सामाजिक-सुधारवाद की ओर एक निर्णायक मोड़ की मांग के साथ-साथ मार्क्सवाद की सभी बुनियादी अवधारणाओं की बुर्जुआ आलोचना की ओर एक निर्णायक मोड़ भी आया। मार्क्सवाद की ऐसी आलोचना काफी अरसे से होती आ रही थी : राजनीतिक मंच से, यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) की ऊंची कुरसियों से और ढेर सारी पुस्तिकाओं और पुस्तकों की शृंखलाओं के जरिए। नई पीढ़ी के लिखे-पढ़े तबकों को दशकों से ऐसी आलोचनाओं के लिए योजनाबध्द ढंग से तैयार किया जाता रहा था। इन तथ्यों के आलोक में यह कोई हैरानी की बात नहीं कि सामाजिक लोकतंत्र में यह 'नई प्रवृत्ति', इस 'नई आलोचना' की प्रवृत्ति समग्र रूप से क्यों नहीं फलती-फूलती। इस नई प्रवृत्ति के विषयों को पल्लवित होकर विकसित होने की कोई खास जरूरत नहीं थी। इसका तो बुर्जुआ साहित्य से समाजवादी साहित्य की ओर भौतिक स्थानांतरण तो हो ही चुका था।

आगे बढ़ें। यदि बर्नस्टीन की सैध्दांतिक आलोचना और राजनीतिक कामनाओं की स्पष्टता कहीं से भी संदिग्ध थी तो फ्रांसीसियों ने इस नई पध्दति को और साफ प्रदर्शित करने का कष्ट उठाया। इस सिलसिले में भी फ्रांस ने अपने पुराने 'सम्मान' को जायज ठहराया। पुराना 'सम्मान' यानी 'फ्रांस वह जमीन है, जहां कहीं से भी ज्यादा ऐतिहासिक वर्ग संघर्ष लड़े गए। हर बार एक फैसले के तईं ...' (एंगेल्स, इंट्रोडक्शन टू मार्क्स, दर 18, ब्रूमेयर)। फ्रांसीसी समाजवादियों ने शुरुआत सैध्दांतिक प्रस्थापना के बजाय काम के स्तर पर की। लोकतांत्रिक रूप से ज्यादा विकसित राजनीतिक हालात ने फ्रांस में बर्नस्टीन को तत्काल व्यवहार के धरातल पर उतार देने के मौके उसके परिणामों सहित मुहैया कराए गए। मिलेरां ने व्यावहारिक बर्नस्टीन का अद्भुत उदाहरण पेश किया।

बर्नस्टीन और वोल्मर अगर मिलेरां की प्रतिरक्षा और उसके यशगान के लिए दौड़ पड़े तो वह अकारण नहीं था। अगर सामाजिक लोकतंत्र अपने सार रूप में सुधारवादी पार्टी है तो इसे खुलकर स्वीकारने का साहस रखती है तो किसी समाजवादी को बुर्जुआ कैबिनेट में शामिल होने का न केवल हक है, बल्कि वह इसके लिए हमेशा कोशिश भी करता रह सकता है। लोकतंत्र का सार अगर वर्गीय प्रभुत्व का खात्मा है तो किसी समाजवादी मंत्री को समस्त बुर्जुआ संसार को वर्ग सहमेल की गाथा गाकर क्यों नहीं मुग्ध करना चाहिए?

उसे कैबिनेट में तब भी क्यों नहीं शामिल करना चाहिए जब सशस्त्र दस्तों द्वारा श्रमिकों की हत्या की घटनाएं वर्गों के लोकतांत्रिक सहमेल के वास्तविक चरित्र का सैकड़ों-हजारों दफा परदाफाश कर चुकी हैं? जिसे फ्रांसीसी समाजवादी गिलोटीन निर्वासन और फांसी के नायक के सिवा कोई दूसरा नाम अब नहीं देते? सितम यह कि समाजवाद के इस विश्वव्यापी अपमान और अवमानना का पुरस्कार और आधार कामगार वर्ग की समाजवादी चेतना हमारी विजय के एकमात्र भ्रष्ट होते चले जाने की प्रक्रिया का पुरस्कार क्या है? ये क्षुद्र किस्म के सुधारों की वैभवपूर्ण परियोजनाएं हैं। ये इतनी क्षुद्र हैं कि इनसे कहीं ज्यादा और बेहतर सुधार बुर्जुआ सरकारों के पास मौजूद हैं।

जानबूझकर अपनी आंखें मूंदे नहीं रखना चाहने वाले साफ-साफ देख सकते हैं कि समाजवाद की यह नई 'आलोचनात्मक' प्रवृत्ति एक नए किस्म के अवसरवाद से ज्यादा या कम और कुछ नहीं है। अगर आम जनता को सिर्फ इस आधार पर परखा जाए कि वह क्या करती है तो साफ हो जाता है कि 'आलोचना की स्वतंत्रता' के मायने समाजवादी लोकतंत्र में अवसरवाद की स्वतंत्रता है। समाजवादी लोकतंत्र पार्टी के एक सुधारवादी लोकतांत्रिक पार्टी में रूपांतरण की स्वतंत्रता है। समाजवाद में बुर्जुआ विचार-तत्व और संस्कार की शुरुआत करने की स्वतंत्रता है।

'स्वतंत्रता' एक महान शब्द है। लेकिन उद्योग की स्वतंत्रता के बैनर तले सर्वाधिक लुटेरे किस्म के युध्द हुए हैं। श्रम की स्वतंत्रता के बैनर तले श्रमिक लूटे गए हैं। 'आलोचना की स्वतंत्रता' शब्दपद के इस आधुनिक इस्तेमाल में भी ऐसा ही फरेब अंतर्निहित है। जो लोग इस बात में यकीन रखते हैं कि उन्होंने सचमुच विज्ञान में तरक्की हासिल की है, वे इस स्वतंत्रता की मांग नहीं करेंगे कि पुराने के साथ-साथ नए विचार चलें बल्कि वे यह चाहेंगे कि नए विचार पुराने विचारों की जगह ले लें। 'आलोचना की स्वतंत्रता जीवित रहे' का मौजूदा आर्त्तनाद खाली कनस्तर से गूंजती आवाज सा प्रतीत होता है।

हम एक ठोस समूह में एक दूसरे का हाथ थामे तेज रफ्तार से एक दुर्गम रास्ते मांग को समग्र रूप से नए विचारों और तर्कों से लैस करते हैं। समाजवाद को वैज्ञानिक आधार देने और इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा के नजरिए से इसकी जरूरत को दरशाने की अपरिहार्यता को नकारा गया। बढ़ती दरिद्रता, सर्वहारापन की प्रक्रिया और पूंजीवादी अंतर्विरोध की तीव्रता जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों को नकारा गया। अंतिम लक्ष्य जैसी अवधारणा को अपरिपक्व घोषित किया गया और सर्वहारा के अधिनायकत्व के विचार को पूरी तरह से खारिज किया गया। उदारवाद और समाजवाद के बीच एंटी-थीसिस को सिध्दांतत: नकारा गया। वर्ग संघर्ष के सिध्दांत को इस गलत आधार पर नकारा गया कि बहुमत की इच्छाओं के अनुरूप शासित होने वाले लोकतांत्रिक समाज में या तो यह व्यावहारिक ही नहीं है या फिर बेईमानी है। आदि ... इत्यादि।

आखिरकार क्रांतिकारी सामाजिक लोकतंत्र से बुर्जुआ सामाजिक-सुधारवाद की ओर एक निर्णायक मोड़ की मांग के साथ-साथ मार्क्सवाद की सभी बुनियादी अवधारणाओं की बुर्जुआ आलोचना की ओर एक निर्णायक मोड़ भी आया। मार्क्सवाद की ऐसी आलोचना काफी अरसे से होती आ रही थी : राजनीतिक मंच से, यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) की ऊंची कुरसियों से और ढेर सारी पुस्तिकाओं और पुस्तकों की शृंखलाओं के जरिए। नई पीढ़ी के लिखे-पढ़े तबकों को दशकों से ऐसी आलोचनाओं के लिए योजनाबध्द ढंग से तैयार किया जाता रहा था। इन तथ्यों के आलोक में यह कोई हैरानी की बात नहीं कि सामाजिक लोकतंत्र में यह 'नई प्रवृत्ति', इस 'नई आलोचना' की प्रवृत्ति समग्र रूप से क्यों नहीं फलती-फूलती। इस नई प्रवृत्ति के विषयों को पल्लवित होकर विकसित होने की कोई खास जरूरत नहीं थी। इसका तो बुर्जुआ साहित्य से समाजवादी साहित्य की ओर भौतिक स्थानांतरण तो हो ही चुका था।

आगे बढ़ें। यदि बर्नस्टीन की सैध्दांतिक आलोचना और राजनीतिक कामनाओं की स्पष्टता कहीं से भी संदिग्ध थी तो फ्रांसीसियों ने इस नई पध्दति को और साफ प्रदर्शित करने का कष्ट उठाया। इस सिलसिले में भी फ्रांस ने अपने पुराने 'सम्मान' को जायज ठहराया। पुराना 'सम्मान' यानी 'फ्रांस वह जमीन है, जहां कहीं से भी ज्यादा ऐतिहासिक वर्ग संघर्ष लड़े गए। हर बार एक फैसले के तईं ...' (एंगेल्स, इंट्रोडक्शन टू मार्क्स, दर 18, ब्रूमेयर)। फ्रांसीसी समाजवादियों ने शुरुआत सैध्दांतिक प्रस्थापना के बजाय काम के स्तर पर की। लोकतांत्रिक रूप से ज्यादा विकसित राजनीतिक हालात ने फ्रांस में बर्नस्टीन को तत्काल व्यवहार के धरातल पर उतार देने के मौके उसके परिणामों सहित मुहैया कराए गए। मिलेरां ने व्यावहारिक बर्नस्टीन का अद्भुत उदाहरण पेश किया।

बर्नस्टीन और वोल्मर अगर मिलेरां की प्रतिरक्षा और उसके यशगान के लिए दौड़ पड़े तो वह अकारण नहीं था। अगर सामाजिक लोकतंत्र अपने सार रूप में सुधारवादी पार्टी है तो इसे खुलकर स्वीकारने का साहस रखती है तो किसी समाजवादी को बुर्जुआ कैबिनेट में शामिल होने का न केवल हक है, बल्कि वह इसके लिए हमेशा कोशिश भी करता रह सकता है। लोकतंत्र का सार अगर वर्गीय प्रभुत्व का खात्मा है तो किसी समाजवादी मंत्री को समस्त बुर्जुआ संसार को वर्गसहमेल की गाथा गाकर क्यों नहीं मुग्ध करना चाहिए?

उसे कैबिनेट में तब भी क्यों नहीं शामिल करना चाहिए जब सशस्त्र दस्तों द्वारा श्रमिकों की हत्या की घटनाएं वर्गों के लोकतांत्रिक सहमेल के वास्तविक चरित्र का सैकड़ों-हजारों दफा परदाफाश कर चुकी हैं? जिसे फ्रांसीसी समाजवादी गिलोटीन निर्वासन और फांसी के नायक के सिवा कोई दूसरा नाम अब नहीं देते? सितम यह कि समाजवाद के इस विश्वव्यापी अपमान और अवमानना का पुरस्कार और आधार कामगार वर्ग की समाजवादी चेतना हमारी विजय के एकमात्र भ्रष्ट होते चले जाने की प्रक्रिया का पुरस्कार क्या है? ये क्षुद्र किस्म के सुधारों की वैभवपूर्ण परियोजनाएं हैं। ये इतनी क्षुद्र हैं कि इनसे कहीं ज्यादा और बेहतर सुधार बुर्जुआ सरकारों के पास मौजूद हैं।

जानबूझकर अपनी आंखें मूंदे नहीं रखना चाहने वाले साफ-साफ देख सकते हैं कि समाजवाद की यह नई 'आलोचनात्मक' प्रवृत्ति एक नए किस्म के अवसरवाद से ज्यादा या कम और कुछ नहीं है। अगर आम जनता को सिर्फ इस आधार पर परखा जाए कि वह क्या करती है तो साफ हो जाता है कि 'आलोचना की स्वतंत्रता' के मायने समाजवादी लोकतंत्र में अवसरवाद की स्वतंत्रता है। समाजवादी लोकतंत्र पार्टी के एक सुधारवादी लोकतांत्रिक पार्टी में रूपांतरण की स्वतंत्रता है। समाजवाद में बुर्जुआ विचार-तत्व और संस्कार की शुरुआत करने की स्वतंत्रता है।

'स्वतंत्रता' एक महान शब्द है। लेकिन उद्योग की स्वतंत्रता के बैनर तले सर्वाधिक लुटेरे किस्म के युध्द हुए हैं। श्रम की स्वतंत्रता के बैनर तले श्रमिक लूटे गए हैं। 'आलोचना की स्वतंत्रता' शब्दपद के इस आधुनिक इस्तेमाल में भी ऐसा ही फरेब अंतर्निहित है। जो लोग इस बात में यकीन रखते हैं कि उन्होंने सचमुच विज्ञान में तरक्की हासिल की है, वे इस स्वतंत्रता की मांग नहीं करेंगे कि पुराने के साथ-साथ नए विचार चलें बल्कि वे यह चाहेंगे कि नए विचार पुराने विचारों की जगह ले लें। 'आलोचना की स्वतंत्रता जीवित रहे' का मौजूदा आर्त्तनाद खाली कनस्तर से गूंजती आवाज सा प्रतीत होता है।

हम एक ठोस समूह में एक दूसरे का हाथ थामे तेज रफ्तार से एक दुर्गम रास्ते पर चल रहे हैं। हम चारों ओर से दुश्मनों से घिरे हुए हैं और हमें उनके फायर (गोलीबारी) के साए में लगातार आगे बढ़ना है। हम मुक्त भाव से लिए गए फैसले के तहत और इस उद्देश्य के लिए इकट्ठा हुए हैं कि हमें दुश्मनों से लड़ना है न कि पास में मौजूद दलदल में फंस जाना है। हमें पता है कि इस दलदल के निवासी हमें पहले ही धिक्कार चुके हैं, क्योंकि हम एक अनन्य समूह हैं। ऐसा समूह जिसने 'सुलह' के बजाय 'संघर्ष' का रास्ता चुना है। अब हममें से कुछ लोग यह कहने लगे हैं कि हमें दलदल में जाने दो। जब हम उन्हें इस बात के लिए शर्मसार करते हैं तो हमें जबाव मिलता है कि तुम लोग कितने पिछड़े हुए हो! हमें कहा जाता है कि तुम्हें क्या उलटा इस बात के लिए शर्मसार नहीं होना चाहिए कि तुम मुक्ति के बेहतर रास्ते पर आमंत्रण (हमारे) को ठुकरा रहे हो? हां महानुभावो! आप लोग हमें न केवल आमंत्रित करने के लिए आजाद हैं, बल्कि जहां चाहें वहां जाने के लिए भी मुक्त हैं। दलदल में जाने तक के लिए भी हैं। दरअसल हमें लगता है कि दलदल ही आपके लिए सही जगह है और हम आपको आपकी सही जगह तक पहुंचाने के लिए भी यथासंभव सहयोग कर देंगे। बस आप हमारा हाथ छोड़ दें। स्वतंत्रता जैसे महान शब्द को कलंकित न करें। इसलिए हम लोग भी अपनी राह चलने को स्वतंत्र हैं। हम भी इस दलदल के खिलाफ संघर्ष करने को मुक्त हैं। हम लोग उनके खिलाफ भी संघर्ष करने को स्वतंत्र हैं जो दलदल की ओर कदम बढ़ा रहे हैं!

 

 

 

 


 

लेनिन (1905)

समाजवाद और धर्म

एन. लेनिन
नोवाया झिज्न, अंक 28, 3 दिसंबर, 1905
संग्रहीत रचनाएं, खंड 10, पृष्ठ 83-87

 

 

वर्तमान समाज पूर्ण रूप से जनसंख्या की एक अत्यंत नगण्य अल्पसंख्यक द्वारा, भूस्वामियों और पूँजीपतियों द्वारा, मज़दूर वर्ग के व्यापक अवाम के शोषण पर आधारित है। यह एक ग़ुलाम समाज है, क्योंकि "स्वतंत्र" मज़दूर जो जीवन भर पूँजीपजियों के लिए काम करते हैं, जीवन-यापन के केवल ऐसे साधनों के "अधिकारी" हैं जो मुनाफ़ा पैदा करने वाले ग़ुलामों को जीवित रखने के लिए, पूँजीवादी ग़ुलामी को सुरक्षित और क़ायम रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं।

मज़दूरों का आर्थिक उत्पीड़न अनिवार्यतः हर प्रकार के राजनीतिक उत्पीड़न और सामाजिक अपमान को जन्म देता है तथा आम जनता के आत्मिक और नैतिक जीवन को निम्न श्रेणी का और अन्धकारपूर्ण बनाना आवश्यक बना देता है। मज़दूर अपनी आर्थिक मुक्ति के संघर्ष के लिए न्यूनाधिक राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन जब तक पूँजी की सत्ता का उन्मूलन नहीं कर दिया जाता तब तक स्वतंत्रता की कोई भी मात्रा उन्हें दैन्य, बेकारी और उत्पीड़न से मुक्त नहीं कर सकती। धर्म बौद्धिक शोषण का एक रूप है जो हर जगह अवाम पर, जो दूसरों के लिए निरन्तर काम करने, अभाव और एकांतिकता से पहले से ही संत्रस्त रहते हैं, और भी बड़ा बोझ डाल देता है। शोषकों के विरुद्ध संघर्ष में शोषित वर्गों की निष्क्रियता मृत्यु के बाद अधिक सुखद जीवन में उनके विश्वास को अनिवार्य रूप से उसी प्रकार बल पहुँचाती है जिस प्रकार प्रकृति से संघर्ष में असभ्य जातियों की लाचारी देव, दानव, चमत्कार और ऐसी ही अन्य चीजों में विश्वास को जन्म देती है। जो लोग जीवन भर मशक्कत करते और अभावों में जीवन व्यतीत करते हैं, उन्हें धर्म इहलौकिक जीवन में विनम्र होने और धैर्य रखने की तथा परलोक सुख की आशा से सान्त्चना प्राप्त करने की शिक्षा देता है। लेकिन जो लोग दूसरों के श्रम पर जीवित रहते हैं उन्हें धर्म इहजीवन में दयालुता का व्यवहार करने की शिक्षा देता है, इस प्रकार उन्हें शोषक के रूप में अपने संपूर्ण अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने का एक सस्ता नुस्ख़ा बता देता है और स्वर्ग में सुख का टिकट सस्ते दामों दे देता है। धर्म जनता के लिए अफीम है। धर्म एक प्रकार की आत्मिक शराब है जिसमें पूँजी के ग़ुलाम अपनी मानव प्रतिमा को, अपने थोड़े बहुत मानवोचित जीवन की माँग को, डुबा देते हैं।

लेकिन वह ग़ुलाम जो अपनी ग़ुलामी के प्रति सचेत हो चुका है और अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष में उठ खड़ा हुआ है, उसकी ग़ुलामी आधी उसी समय समाप्त हो चुकी होती है। आधुनिक वर्ग चेतन मजदूर, जो बड़े पैमाने के कारखाना-उद्योग द्वारा शिक्षित और शहरी जीवन के द्वारा प्रबुद्ध हो जाता है, नफरत के साथ धार्मिक पूर्वाग्रहों को त्याग देता है और स्वर्ग की चिन्ता पादरियों और पूँजीवादी धर्मांधों के लिए छोड़ कर अपने लिए इस धरती पर ही एक बेहतर जीवन प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। आज का सर्वहारा समाजवाद का पक्ष ग्रहण करता है जो धर्म के कोहरे के ख़िलाफ संघर्ष में विज्ञान का सहारा लेता है और मज़दूरों को इसी धरती पर बेहतर जीवन के लिए वर्तमान में संघर्ष के लिए एकजुट कर उन्हें मृत्यु के बाद के जीवन के विश्वास से मुक्ति दिलाता है।

धर्म को एक व्यक्तिगत मामला घोषित कर दिया जाना चाहिए। समाजवादी अक्सर धर्म के प्रति अपने दृष्टिकोण को इन्हीं शब्दों में व्यक्त करते हैं। लेकिन किसी भी प्रकार की ग़लतफहमी न हो, इसलिए इन शब्दों के अर्थ की बिल्कुल ठीक व्याख्या होनी चाहिए। हम माँग करते हैं कि जहाँ तक राज्य का सम्बन्ध है, धर्म को व्यक्तिगत मामला मानना चाहिए। लेकिन जहाँ तक हमारी पार्टी का सवाल है, हम किसी भी प्रकार धर्म को व्यक्तिगत मामला नहीं मानते। धर्म से राज्य का कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए और धार्मिक सोसायटियों का सरकार की सत्ता से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रहना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को यह पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए कि वह जिसे चाहे उस धर्म को माने, या चाहे तो कोई भी धर्म न माने, अर्थात नास्तिक हो, जो नियमतः हर समाजवादी समाज होता है। नागरिकों में धार्मिक विश्वास के आधार पर भेदभाव करना पूर्णतः असहनीय है। आधिकारिक काग़ज़ात में किसी नागरिक के धर्म का उल्लेख भी, निस्सन्देह, समाप्त कर दिया जाना चाहिए। स्थापित चर्च को न तो कोई सहायता मिलनी चाहिए और न पादरियों को अथवा धार्मिक सोसायटियों को राज्य की ओर से किसी प्रकार की रियायत देनी चाहिए। इन्हें सम-विचार वाले नागरिकों की पूर्ण स्वतन्त्र संस्थाएँ बन जाना चाहिए, ऐसी संस्थाएँ जो राज्य से पूरी तरह स्वतंत्र हों। इन माँगों को पूरा किये जाने से वह शर्मनाक और अभिशप्त अतीत समाप्त हो सकता है जब चर्च राज्य की सामन्ती निर्भरता पर, और रूसी नागरिक स्थापित चर्च की सामन्ती निर्भरता पर जीवित था, जब मध्यकालीन, धर्म-न्यायालयीय क़ानून (जो आज तक हमारी दंडविधि संहिताओं और क़ानूनी किताबों में बने हुए हैं) अस्तित्व में थे और लागू किये जाते थे, जो आस्था अथवा अनास्था के आधार पर मनुष्यों को दण्डित करते, मनुष्य की अन्तरात्मा का हनन किया करते थे, और आरामदेह सरकारी नौकरियों तथा सरकार द्वारा प्राप्त आमदनियों को स्थापित चर्च के इस या उस धर्म विधान से सम्बद्ध किया करते थे। समाजवादी सर्वहारा आधुनिक राज्य और आधुनिक चर्च से जिस चीज़ की माँग करता है, वह है-राज्य से चर्च का पूर्ण पृथक्करण।

रूसी क्रांति को यह माँग राजनीतिक स्वतन्त्रता के एक आवश्यक घटक के रूप में पूरी करनी चाहिए। इस मामले में रूसी क्रान्ति के समक्ष एक विशेष रूप से अनुकूल स्थिति है, क्योंकि पुलिस-शासित सामन्ती एकतन्त्र की घृणित नौकरशाही से पादरियों में भी असन्तोष, अशान्ति और घृणा उत्पन्न हो गयी है। रूसी ऑर्थोडाक्स चर्च के पादरी कितने भी अधम और अज्ञानी क्यों न हों, रूस में पुरानी, मध्यकालीन व्यवस्था के पतन के वज्रपात से वे भी जागृत हो गये हैं, वे भी स्वतन्त्रता की माँग में शामिल हो रहे हैं। नौकरशाही व्यवहार और अफ़सरवाद के, पुलिस के लिए जासूसी करने के ख़िलाफ़- जो "प्रभु के सेवकों" पर लाद दी गयी है - विरोध प्रकट कर रहे हैं। हम समाजवादियों को चाहिए कि इस आन्दोलन को अपना समर्थन दें। हमें पुरोहित वर्ग के ईमानदार सदस्यों की माँगों को उनकी परिपूर्णता तक पहुँचाना चाहिए और स्वतन्त्रता के बारे में उनकी प्रतिज्ञाओं के प्रति उन्हें दृढ़ निश्चयी बनाते हुए यह माँग करनी चाहिए कि वे धर्म और पुलिस के बीच विद्यमान सारे सम्बन्धों को दृढ़तापूर्वक समाप्त कर दें। या तो तुम सच्चे हो, और इस हालत में तुम्हें चर्च और राज्य तथा स्कूल और चर्च के पूर्ण पृथक्करण का, धर्म के पूर्ण रूप से और सर्वथा व्यक्तिगत मामला घोषित किये जाने का पक्ष ग्रहण करना चाहिए। या फिर तुम स्वतन्त्रता के लिए इन सुसंगत माँगों को स्वीकार नहीं करते, और इस हालत में तुम स्पष्टतः अभी तक आरामदेह सरकारी नौकरियों और सरकार से प्राप्त आमदनियों से चिपके हुए हो। इस हालत में तुम स्पष्टतः अपने शस्त्रों की आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास नहीं करते, और राज्य की घूस प्राप्त करते रहना चाहते हो। ऐसी हालत में समस्त रूस के वर्ग चेतन मज़दूर तुम्हारे ख़िलाफ़ निर्मम युद्ध की घोषणा करते हैं।

जहाँ तक समाजवादी सर्वहारा की पार्टी का प्रश्न है, धर्म एक व्यक्तिगत मामला नहीं है। हमारी पार्टी मज़दूर वर्ग की मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाले अग्रणी योद्धाओं की संस्था है। ऐसी संस्था धार्मिक विश्वासों के रूप में वर्ग चेतना के अभाव, अज्ञान अथवा रूढ़िवाद के प्रति न तो तटस्थ रह सकती है, न उसे रहना चाहिए। हम चर्च के पूर्ण विघटन की मांग करते हैं ताकि धार्मिक कोहरे के ख़िलाफ़ हम शुद्ध सैद्धान्तिक और वैचारिक अस्त्रों से, अपने समाचारपत्रों और भाषणों के साधनों से संघर्ष कर सकें। लेकिन हमने अपनी संस्था, रूसी सामाजिक जनवादी मज़दूर पार्टी की स्थापना ठीक ऐसे ही संघर्ष के लिए, मज़दूरों के हर प्रकार के धार्मिक शोषण के विरुद्ध संघर्ष के लिए की है। और हमारे लिए वैचारिक संघर्ष केवल एक व्यक्तिगत मामला नहीं है, सारी पार्टी का, समस्त सर्वहारा का, मामला है। यदि बात ऐसी ही है, तो हम अपने कार्यक्रम में यह घोषणा क्यों नहीं करते कि हम अनीश्वरवादी हैं? हम अपनी पार्टी में ईसाइयों अथवा ईश्वर में आस्था रखने वाले अन्य धर्मावलम्बियों के शामिल होने पर क्यों नहीं रोक लगा देते?

इस प्रश्न का उत्तर ही उन अति महत्वपूर्ण अन्तरों को स्पष्ट करेगा जो बुर्जुआ डेमोक्रेटों और सोशल डेमोक्रेटों द्वारा धर्म का प्रश्न उठाने के तरीक़ों में विद्यमान हैं।

हमारा कार्यक्रम पूर्णतः वैज्ञानिक, और इसके अतिरिक्त भौतिकवादी विश्व दृष्टिकोण पर आधारित है। इसलिए हमारे कार्यक्रम की व्याख्या में धार्मिक कुहासे के सच्चे ऐतिहासिक और आर्थिक स्रोतों की व्याख्या भी आवश्यक रूप से शामिल है। हमारे प्रचार कार्य में आवश्यक रूप से अनीश्वरवाद का प्रचार भी शामिल होना चाहिए; उपयुक्त वैज्ञानिक साहित्य का प्रकाशन भी, जिस पर एकतन्त्रीय सामन्ती शासन ने अब तक कठोर प्रतिबन्ध लगा रखा था और जिसे प्रकाशित करने पर दण्ड दिया जाता था, अब हमारी पार्टी के कार्य का एक क्षेत्र बन जाना चाहिए। अब हमें सम्भवतः एंगेल्स की उस सलाह का अनुसरण करना होगा जो उन्होंने एक बार जर्मन समाजवादियों को दी थी-अर्थात हमें फ़्रांस के अठारहवीं शताब्दी के प्रबोधकों और अनीश्वरवादियों के साहित्य का अनुवाद करना और उसका व्यापक प्रचार करना चाहिए।

लेकिन हमें किसी भी हालत में धार्मिक प्रश्न को अरूप, आदर्शवादी ढंग से, वर्ग संघर्ष से असम्बद्ध एक "बौद्धिक" प्रश्न के रूप में उठाने की ग़लती का शिकार नहीं बनना चाहिए, जैसा कि बुर्जुआ वर्ग के बीच उग्रवादी जनवादी कभी-कभी किया करते हैं। यह सोचना मूर्खता होगी कि मज़दूर अवाम के सीमाहीन शोषण और संस्कारहीनता पर आधारित समाज में धार्मिक पूर्वाग्रहों को केवल प्रचारात्मक साधनों से ही समाप्त किया जा सकता है। इस बात को भुला देना कि मानव जाति पर लदा धर्म का जुवा समाज के अन्तर्गत आर्थिक जुवे का ही प्रतिबिम्ब और परिणाम है, बुर्जुआ संकीर्णता ही होगी। सर्वहारा यदि पूँजीवाद की काली शक्तियों के विरुद्ध स्वयं अपने संघर्ष से प्रबुद्ध नहीं होगा तो पुस्तिकाओं और शिक्षाओं की कोई भी मात्रा उन्हें प्रबुद्ध नहीं बना सकती। हमारी दृष्टि में, धरती पर स्वर्ग बनाने के लिए उत्पीड़ित वर्ग के इस वास्तविक क्रान्तिकारी संघर्ष में एकता परलोक के स्वर्ग के बारे में सर्वहारा दृष्टिकोण की एकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

यही कारण है कि हम अपने कार्यक्रम में अपनी नास्तिकता को न तो शामिल करते हैं और न हमें करना चाहिए। और यही कारण है कि हम ऐसे सर्वहाराओं को, जिनमें अभी तक पुराने पूर्वाग्रहों के अवशेष विद्यमान हैं, अपनी पार्टी में शामिल होने पर न तो रोक लगाते हैं, न हमें इस पर रोक लगानी चाहिए। हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण की शिक्षा सदा देंगे और हमारे लिए विभिन्न "ईसाइयों" की विसंगतियों से संघर्ष चलाना भी जरूरी है। लेकिन इसका जरा भी यह अर्थ नहीं है कि धार्मिक प्रश्न को प्रथम वरीयता दे देनी चाहिये। न ही इसका यह अर्थ है कि हमें उन घटिया मत-मतान्तरों और निरर्थक विचारों के कारण, जो तेजी से महत्वहीन होते जा रहे हैं और स्वयं आर्थिक विकास की धारा में तेजी से कूड़े के ढेर की तरह किनारे लगते जा रहे हैं, वास्तविक क्रान्तिकारी आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष की शक्तियों को बँट जाने देना चाहिए।

प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ वर्ग ने अपने आप को हर जगह धार्मिक झगड़ों को उभाड़ने के दुष्कृत्यों में संलग्न किया है, और वह रूस में भी ऐसा करने जा रहा है-इसमें उसका उद्देश्य आम जनता का ध्यान वास्तविक महत्व की और बुनियादी आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं से हटाना है जिन्हें अब समस्त रूस का सर्वहारा वर्ग क्रांतिकारी संघर्ष में एकजुट हो कर व्यावहारिक रूप से हल कर रहा है। सर्वहारा की शक्तियों को बाँटने की यह प्रतिक्रियावादी नीति, जो आज ब्लैक हंड्रेड (राजतंत्र समर्थक गिरोहों) द्वारा किये हत्याकाण्डों में मुख्य रूप से प्रकट हुई है, भविष्य में और परिष्कृत रूप ग्रहण कर सकती हैं। हम इसका विरोध हर हालत में शान्तिपूर्वक, अडिगता और धैर्य के साथ सर्वहारा एकजुटता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की शिक्षा द्वारा करेंगे - एक ऐसी शिक्षा द्वारा करेंगे जिसमें किसी भी प्रकार के महत्वहीन मतभेदों के लिए कोई स्थान नहीं है। क्रान्तिकारी सर्वहारा, जहाँ तक राज्य का संबंध है, धर्म को वास्तव में एक व्यक्तिगत मामला बनाने में सफल होगा। और इस राजनीतिक प्रणाली में, जिसमें मध्यकालीन सड़न साफ़ हो चुकी होगी, सर्वहारा आर्थिक ग़ुलामी के, जो कि मानव जाति के धार्मिक शोषण का वास्तविक स्रोत है, उन्मूलन के लिए सर्वहारा वर्ग व्यापक और खुला संघर्ष चलायेगा।

 

 

 

 

कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन और उसका ढाँचा — लेनिन

 

 

 

लेनिन (1922)

एक प्रचारक की टिप्पणियाँ

ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने के बारे में; हताशा से हानि; व्यापार की उपयोगिता, मेनशेविको के प्रति रवैया, इत्यादि[1]

फरवरी, 1922 के अन्त में लिखित

 

 

 

I

उदाहरण के द्वारा

आईये हम खुद की कल्पना एक ऐसे मनुष्य की तरह के रूप में करें जो एक बहुत ही ऊँचे, तीखी ढलान वाले और अब तक अनन्वेषित पहाड़ पर चढ़ रहा है । यह भी कल्पना करें कि उसने बेमिसाल कठिनाइयों और खतरों का सामना किया है और अपने किसी भी पूर्ववर्ती पर्वतारोही के मुकाबले बहुत अधिक ऊँचाई तक पहुँच चुका है लेकिन अभी भी वह शिखर तक नही पहुँच पाया है। वह खुद को एक ऐसी स्थिति में पाता है जिसमें उसके आगे बढ़ने के लिए जो रास्ता चुना है उस पर बढ़ते रहना न केवल कठिन और खतरनाक है बल्कि निश्चित तौर पर असम्भव है। वह वापस लौटने, नीचे उतरने और ऐसा दूसरा रास्ता ढूँड़ने को मजबूर होता है जो सम्भवतः अधिक लम्बा हो लेकिन उसे शिखर तक पहुँचा सके। उस ऊँचाई से उतरना जिस तक कि इससे पहले कोई न पहुँचा हो , हमारे इस काल्पनिक पर्वतारोही के लिए सम्भवतः चढ़ने से भी अधिक खतरनाक और कठिन है क्योकि उसमे फिसलने का खतरा है; पाँव टिकाने की जगह ढूँड़ना आसान नहीं है; और उसमें वह उल्लास नहीं है जो किसी को सीधे लक्ष्य की दिशा में ऊपर बढ़ने जाने महसूस होता है, वगैरह, वगैरह। उसे खुद को एक रस्सी से बाँध लेना होता है, घण्टों अपने पर्वतीय उपकरणों के साथ इस बात के लिए जूझना पड़ता है कि पाँव टिकाने की एक जगह या रस्सी को मजबूती से बाँधने के लिए एक खूँटा-नुमा ऊभार काटा जा सके, उसे कछुए की रफ्तार से चलना पड़ता है, नीचे की तरफ, अपने लक्ष्य से क्रमशः दूर होते हुए उतार पर और उसे यह पता नहीं है कि यह अत्यधिक खतरनाक और पीड़ादायी नीचे उतरने का क्रम कब समाप्त होगा और क्या इससे अधिक सुरक्षित कोई रास्ता है जिससे कोई अधिक बेधड़क तरीके से, अधिक तेजी से और अधिक सीधे रास्ते से चोटी तक पहुँच सकता हो।

ऐसा सोचना शायद ही स्वाभाविक हो कि एक ऐसा व्यक्ति जो ऐसे अभूतपूर्व ऊँचाई तक चढ़ चुका हो और खुद को ऐसी परस्थितियों में पाये उसको हताशा के क्षणों से न गुजरना पड़े। अधिक सम्भावना यही है कि ऐसे क्षण अधिकाधिक हों, अधिक निरन्तरता से आये और उन्हें बर्दाश्त करना अधिक से अधिक मुश्किल होता जाय यदि वह नीचे के उन लोगों की आवाज को सुन रहा हो, जो एक दू्रबीन के माध्यम से एक सुरक्षित दूरी से उसके खतरनाक उतराई को देख रहे हों जिसे वह संज्ञा भी नहीं दी जा सकती है जिसे ‘स्मेना वेख’[2] के लोग ‘ब्रेक लगाकर उतरना’ कहते हैं क्यों कि ब्रेक में ही यह पूर्वधारणा निहित है कि यह एक अच्छी तरह डिजाइन की हुई और सुपरीक्षित वाहन का हिस्सा है और एक अच्छी तरह बना हुआ सड़क और पूर्वपरीक्षित उपकरण मौजूद है। लेकिन इस मामले में न तो कोई वाहन है, न सड़क है और ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका पहले परीक्षण किया गया हो।

नीचे से आ रही आवाजों में दुर्भावनापूर्ण हर्ष की गूञ्ज है। वे उसे छुपाते नहीं है; वे उल्लासपूर्वक हँसते हैं। “वह एक मिनट में ही गिर जाऐगा। उस पागल के लिए यही उचित है। दूसरे लोग अपने दुर्भावनापूर्ण हर्ष को छुपाते हैं और आम तौर पर जुडास गोलोव्लीयोव[3] की तरह बर्ताव करते हैं। वे विलाप करते हैं और दुख के साथ अपनी आखों को स्वर्ण की ओर उठाते हैं, मानो कह रहे हो कि यह देख कर हमें अपार दुख होता है कि हमारा डर सही साबित हुआ है! लेकिन हम लोगों ने, जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस पर्वत पर चढ़ने की एक बुद्धिसम्मत योजना बनाने पर खर्च किया है, क्या यह माँग नहीं की थी कि चढ़ाई को तब तक के लिए स्थगित कर दिया जाय जब तक कि हमारी योजना मुकम्मिल न हो जाय। और अगर हमने इस मार्ग को अपनाये जाने का अतना प्रबल रूप से विरोध किया था जिसे यह पागल अब छोड़ रहा है (देखो, देखो वह पीछे मुड़ रहा है! वह उतर रहा है! उसे एक कदम रखने के लिए घण्टों की तैयारी करनी पड़ रही है। लेकिन जब हमने बार-बार इस बात की माँग की थी कि सब्र और सावधानी से काम लिए जाय तो हमें भरपूर गालियाँ दी गयीं।) यदि हम इस पागल की इतनी शिद्दत के साथ निन्दा की है और हर किसी को उसकी नकल करने या उसकी मदद करने के खिलाफ चेतावनी दी है तो हमने ऐसा केवल इस पर्वत को फतह करने की महान योजना के प्रति हमारी निष्ठा के लिए किया है और इस लिए किया है कि इस महान योजना को आमतौर पर बदनाम हो जाने से रोका जा सके।” खुशी की बात यह है कि हमने जिन परिस्थितियों का वर्णन किया है उसमें हमारे काल्पनिक यात्री को पर्वतारोहण की धारणा के “सच्चे मित्रों” की आवाजें सुनायी नहीं दे सकती; क्योंकि यदि उसे वे सुनायी दे जाए तो सम्भव है कि उसे मितली आ जाय। और मितली से, जैसा कि कहा जाता है, साफ दिमाग और मजबूत कदम बनाये रखने में दिक्कत होती है , खास तौर पर ऊँचाई में ।

II

उपमा के बिना

सादृष्य कोई प्रमाण नहीं होता। हर उपमा की सीमाएँ होती हैं। ये निर्विवाद और सामान्य सत्य हैं; लेकिन हर सादृष्य की सीमाओं को देखने के लिए उन्हे याद करना नुकसानदेह नहीं होना चाहिए।

क्रान्ति के माधयम से रुसी सर्वहारा वर्ग ने जिन ऊँचाइयों को छूआ है वे गगनचुम्बी हंक यदि उनकी तुलना न केवल 1789 और 1793 से की जाय, बल्कि 1871 से भी की जाय। हमे उनका लेखा जोखा, अवश्य ही, जितना भी अधिक सम्भव हो उतनी ही निष्पक्षता से, स्पष्टता के साथ और सटीक तौर पर लेना चाहिए, उन सभी का जो हमने किया है या जो हम नहीं कर सके हैं। यदि यह ऐसा करें तो हम तो अपने दिमाग साफ रख पायेंगे। और हमें चक्कर आने , विभ्रम और हताशा की शिकायत नहीं होगी ।

हमने बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति को उससे अधिक पूर्णता के साथ सम्पन्न किया जितना कि इससे पहले दुनिया में कहीं भी कभी भी किया गया हो। यह एक महान उपलब्धि है और कोई हमें इससे वंचित नहीं कर सकता।

हमने सर्वधिक प्रतिक्रियावादी साम्राज्यवादी युद्ध से निकलने के कार्य को क्रान्तिकारी ढंग से सम्पन्न किया। यह भी एक ऐसी उपलब्धि है जिससे दुनिया की कोई ताकत हमें वंचित नहीं कर सकती; यह उपलब्धि और अधिक मूल्यवान इस कारण के चलते भी है कि यदि पूँजीवाद का अस्तित्व बना रहता है तो निकट भविष्य में ही प्रतिक्रियावादी साम्राज्यवादी नरसंहारों का घटित होना अपरिहार्य है; और बीसवीं शताब्दी के लोग उस ‘बासले धोषणापत्र’ के एक द्वितीय संसकरण से संतुष्ट होने वाले नहीं है; जिसके द्वारा गद्दारों, दूसरे और ढ़ाइवें अन्तरराष्ट्रीय के नायको ने 1912 और 1914- 18 में खुद को और मजदूरों को बेबकूफ बनाया।

हमने एक सोवियत किस्म के राज्य का निर्माण किया है और इसके माध्यम से हमने विश्व इतिहास के एक नवीन युग का सूत्रपात किया है, जो सर्वहारा वर्ग के राजनीतिक शासन का युग है और जो पूँजीवादी शासन के युग का स्थानापन्न बनने वाली है। कोई हमें इससे भी वंचित नहीं कर सकता। हालांकि सोवियत किस्म के राज्य को अभी भी अनेक देशों के मेहनतकश वर्गों के व्यावहारिक अनुभव के द्वारा अनुपूरित किया जाना है।

लेकिन हमने अभी समाजवादी अर्थव्यवस्था की नीवों को गढ़ने का काम भी पूरा नहीं किया है और मरणासन्न पूँजीवाद की दुशमनाना ताकत अभी भी हमें इससे वंचित कर सकती है। हमें इस बात को स्पष्टता से समझना चाहिए और बेबाकी से स्वीकार करना चाहिए क्योंकि विभ्रम (और सर चकराने, खास कर ऊँचाई पर) से अधिक खतरनाक कुछ नहीं होता। और इस बात को स्वीकार करने में कुछ भी भयंकर नहीं है, कुछ भी ऐसा नहीं है जो थोड़ी भी हताशा के किए जायज जमीन मुहैया करता हो — क्योंकि हमने सदैव मार्क्सवाद के इस प्रारम्भिक सत्य पर जोर दिया है और उसे दुहराया है — कि समाजवाद की विजय के लिए कई विकसित देशों के सर्वहारा वर्ग का संयुक्त प्रयास जरूरी है । हम एक पिछड़े हुए देश में अभी भी अकेले हैं, एक ऐसे देश में जो दुसरों से अधिक तबाह हुआ है लेकिन हमने पर्याप्त सफलताएँ भी हासिल की हैं — इससे की अधिक हमने क्रान्तिकरी सर्वहारा वर्ग की सेना को अक्षुण बनाए रखा है; हमने इसकी दाँव-पेंच की क्षमता को सुरक्षित रखा है; हमने अपने दिमाग को साफ बनाये रखा है और सन्तुलित रूप से इसका आकलन कर सकते हैं कि कब कहाँ और कितना पीछे हटा जाय (जिससे कि बाद में आगे की ओर छलाँग लगायी जा सके) : कहाँ, कब और कैसे उन कामों को शुरु किया जाए जो अधूरे रह गये हैं। वे कम्युनिस्ट अभिशप्त है जो यह सोचते हैं कि समाजवादी अर्थव्यवस्था के बुनियाद को पूरा करने का काम (खास कर एक छोटी किसानी वाले देश में) जैसे एक युगनिर्माणकारी कार्यभार को बिना गलतियाँ किए, बिना पीछे हटे, और जो अधूरा छूट गया हो या गलत ढ़ग से अंजाम दिया गया हो, उनमें अनेकानेक बदलाव किए बिना पूरा किया जा सकता है। वे कम्युनिस्ट जिन्हें कोई विभ्रम नहीं है, जो हताशा के आगे झुकते नहीं हैं, और जो एक अत्यन्त ही कठिन कार्यभार को पूरा करने के लिए “शुरूआत से शुरू करने” के लिए अपनी ताकत और लचीलेपन को सुरक्षित रखते हैं, अभिशप्त नहीं हैं और अधिक सम्भावना यही है कि वे खत्म न हों।

और इससे भी कम इस बात की इजाजत है कि न्यूनतम अंशों में भी हताशा के लिए गुञ्जाइश छोडी जाय, ऐसा करने का और कम आधार इस लिए भी है कि हमारे देश में व्याप्त तबाही, गरीबी, पिछड़ेपन और भुखमरी के बावजूद, उस अर्थशास्त्र में जो समाजवाद का मार्ग निर्मित करती है, हमने तरक्की करना शुरु कर दिया है, हमारे साथ ही साथ, पूरी दुनिया में, ऐसे देश जो हमसे अधिक उन्नत और हजार गुना अधिक सम्पन्न एवं सैन्य मामलो में ताकतवर हैं, अभी भी बदतरी की राह पर हैं, अपने महिमामण्डित, सुपरिचित, पूँजीवादी आर्थिक क्षेत्र में, जिसमें उन्होंने सदियों से काम किया है।

III

लोमड़ी पकड़ना; लेवी और सेर्राती

नीचे दिए गये तरीके को लोमड़ियाँ पकड़ने का सबसे विश्वसनीय तरीका कहा जाता है। जिन लोमड़ियों का पीछा किया जा रहा हो उन्हें कुछ दूरी पर एक ऐसी रस्सी से घेर दिया जाता है जिसे हिमाच्छादित जमीन से कुछ ऊँचाई पर जमाया गया हो और उसमें छोटी छोटी लाल झण्डियाँ बाँध दी जातीं हैं। इस प्रत्यक्षतः कित्रिम मानवीय उपकरण से डरकर लोमड़ियाँ तभी और वहीं प्रकट होतीं हैं जहाँ झण्डियों के इस बाड़े में कोई जगह खुली छोड़ी जाती है; और शिकारी उसके लिए उसी खुली छोड़ दी गयी जगह पर इंतजार करता होता है। कोई यही सोचेगा की सावधानी उस जानवर की सबसे खास फितरत होगी जिसका हर कोई शिकार करता हो। लेकिन जैसा की इस मामले में भी सामने आता है “आवश्यकता से अधिक खींचा गया गुण” भी एक दोष है। लोमड़ी इसी सिर्फ लिए पकड़ा जाता है कि वह अति-सावधान होता है।

कम्युनिस्ट अन्तरराष्ट्रीय के तीसरे कांग्रेस में अति-सावधानी के चलते ही मुझसे हुई एक गलती को मुझे जरूर स्वीकार करना चाहिए। उस कांग्रेस में मैं अधिकतम दक्षिण सिरे पर था। मैं इस बाबत सुनिश्चित था कि यही एकमात्र ग्रहणयोग्य सही अवस्थिति थी, जबकि प्रतिनिधियों का एक बड़े (और प्रभावशाली) समूह ने , जिसका नेतृत्व जर्मन, हंगेरियाई और इतालवी कामरेड कर रहे थे, असाधारण रूप से "वाम" और गलत ढंग से वामपन्थी अवस्थिति ले रखी थी, और बहुत अधिक मौकों पर, उन परिस्थितियों का संजीदगी से आकलन करने की जगह जो तात्कालिक और सीधे क्रान्तिकारी कार्रवाई के लिहाज से बहुत अधिक अनुकूल नहीं थी, वे पूरे जोशोखरोश के साथ छोटी लाल झण्डियाँ हिलाने में मशगूल थे। सावधानी की भावना और वामपन्थ की ओर इस निस्सन्देह भटकाव को रोकने के लिए, जो कि कम्युनिस्ट अन्तरराष्ट्रीय के सम्पूर्ण रण-कौशल को एक फर्जी दिशा दे देता, मैंने लेवी के समर्थन में जो कुछ भी मुमकिन था वह किया। मैंने यह तर्क दिया कि शायद उसका दिमाग फिर गया हो (मैं इससे इनकार नहीं करता कि उसका दिमाग फिर चुका था) क्योंकि की वह वामपन्थियों की गलतियों से बेहद डरा हुआ था, और मैंने यह दलील दी कि ऐसा कम्युनिस्टों के साथ ऐसा अक्सर हुआ है कि उनका दिमाग फिरने के बाद फिर 'वापस' अपनी जगह पर आ गया हो। वामपन्थियों के दबाव में यह स्वीकार करते हुए भी कि लेवी एक मेनशेविक था, मैंने कहा कि इस तथ्य को स्वीकार करने मात्र से सवाल ख़त्म नहीं हो जाता है। मसलन, रूस में मेनशेविकों और बोलशेविकों के बीच संघर्षों के पन्द्रह वर्षों का पूरा इतिहास (1903-17) साबित करता है और जैसा कि तीन रूसी क्रान्तियाँ भी सिद्ध करती हैं कि आम तौर पर मेनशेविक पूरी तरह गलत थे और वे, दरअसल, मजदूर वर्ग के आन्दोलन में पूँजीपति वर्ग के एजेण्ट थे। यह तथ्य निर्विवाद है। लेकिन यह निर्विवाद तथ्य अन्य तथ्यों को निरस्त नहीं करता कि बाज़ अलग-अलग मामलों में मेनशेविक सही थे और बोलशेविक गलत थे, जैसे मिसाल के तौर पर 1907 में स्तोलिपिन ड्यूमा के बहिष्कार के सवाल पर।

कम्युनिस्ट अन्तरराष्ट्रीय के तीसरे कांग्रेस के आठ महीने गुजर चुके हैं। स्वाभाविक तौर पर वाम के साथ हमारा विवाद अब पुराना पड़ चुका है; घटनाक्रम ने इसे हल कर दिया है। यह साबित हो चुका है कि लेवी के मामले में मैं गलत था, क्योंकि उसने निर्णायक रूप से यह दिखा दिया है कि उसने मेनशेविक रास्ता एक दुर्घटना के तौर पर नहीं लिया था, अस्थायी तौर पर नहीं लिया था, वामपन्थियों के खतरनाक गलतियों का मुकबला करते हुए “अधिक दूर चले जाने” के चलते नहीं लिया था बल्कि अपनी प्रकृति के चलते ही जानबूझ कर और स्थयी रूप से लिया था। इस बात को इमानदारी से स्वीकार करने के बजाय कि कम्युनिस्ट अन्तरराष्ट्रीय के तीसरे कांग्रेस के बाद उसके लिए पार्टी में पुनर्प्रवेश के लिए अपील करना जरूरी है, जैसा कि हर उस आदमी को करना चाहिए था जिसका दिमाग वामपन्थियों द्वारा की जा रही गलतियों से चिढ़ कर फिर गया हो, लेवी पार्टी के साथ धूर्ततापूर्ण चालबाजियों के खेल में लग गया उसके पहिये में फच्चर फँसाने लगा, यानी, वह वास्तव में पूँजीपति वर्ग के उन एजेण्टों, दूसरे और ढाईवें अन्तरराष्ट्रीय की सेवा करने लगा। निश्चित तौर पर जर्मन कम्युनिस्ट सही थे जब हाल ही में उन्होंने इसका जवाब उन कुछ और महानुभावों को अपनी पार्टी से निकल बाहर करने के द्वारा दिया जो पॅाल लेवी को इस महान उद्यम में गुप्त रूप से मदद कर रहे थे।

कम्युनिस्ट अन्तरराष्ट्रीय के तीसरे कांग्रेस के बाद से जर्मन और इतालवी कम्युनिस्ट पार्टियों के विकास ने यह दर्शाया है कि उस कांग्रेस में वाम द्वारा की गयी गलातियों को चिह्नित कर लिया गया है और उन्हें सुधारा जा रहा है — थोड़ा-थोड़ा करके, धीरे-धीरे, लेकिन निरन्तरता के साथ; कम्युनिस्ट अन्तरराष्ट्रीय के तीसरे कांग्रेस के फैसलों को निष्ठापूर्वक लागू किया जा रहा है। एक पुराने किस्म की यूरोपीय संसदीय पार्टी को—जो दरअसल एक सुधारवादी पार्टी है और उसपर क्रान्तिकारी रंगों का सिर्फ हलका सा स्पर्श ही है—एक नयी किस्म की पार्टी में, एक असली क्रान्तिकारी, असली कम्युनिस्ट पार्टी में रूपान्तरित करने की प्रक्रिया अत्यधिक श्रमसाध्य है। यह बात, सम्भवतः, सबसे अधिक स्पष्टता के साथ फ़्रांस के अनुभव से प्रदर्शित हुई है। रोजमर्रा के जीवन में पार्टी-काम के किस्म को बदलने की, इसके नीरस प्रवाह से पार्टी को बाहर निकालने की प्रक्रिया; पार्टी को क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग के हिरावल में परिवर्तित करने की प्रक्रिया, बिना इसे जनता से विच्छिन्न होने की इजाजत दिए, बल्कि, इसके विपरीत, इसे और नजदीकी से उनके साथ जोड़ कर, उन्हें क्रान्तिकारी चेतना से लैस कर और क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए उत्साहित कर, बहुत कठिन, लेकिन उतनी ही जरूरी है। यदि यूरोपीय कम्युनिस्ट उन अन्तरालों (सम्भवतः बहुत छोटे) का लाभ नहीं उठाते हैं जो खासतौर पर तीक्ष्ण क्रान्तिकारी संघर्षों के—जैसा कि यूरोप और अमेरिका के अनेक पूँजीवादी देशों में 1921 और 1922 के शुरुआत में हुआ—बीच हासिल होता है, इस बात के लिए कि पार्टियों की सम्पूर्ण संरचना और उनके कामकाज में बुनियादी, आन्तरिक, गम्भीर पुनर्गठन लाया जाये तो वे गम्भीरतम अपराध कर रहे होंगे। सौभाग्य से इस डर की कोई वजह नहीं है। चुपचाप, निरन्तर और शान्ति के साथ, बहुत तेजी से नहीं लेकिन यूरोप और अमेरिका में असली कम्युनिस्ट पार्टी, सर्वहारा वर्ग के असली क्रान्तिकारी हिरावल के निर्माण का गम्भीर काम आरम्भ हो चुका है और आगे बढ़ रहा है।

लोमड़ी पकड़ने जैसे महत्वहीन चीज से हासिल किया गया राजनीतिक सबक भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। एक ओर, अत्यधिक सावधानी से गलतियाँ होतीं हैं। वहीँ दूसरी ओर, यह बात भी नहीं भूलना चाहिए कि यदि हम महज “भावना” में बह जाये या परिस्थिति का संजीदा ढंग से आकलन करने के बजाय छोटी लाल झण्डियाँ हिलाने में मशगूल हो जायें, तो हम न सुधारे जाने योग्य गलतियाँ कर सकते हैं, हम ऐसे वक्त पर कुर्बान को सकते हैं जबकि इसकी एकदम ही कोई जरूरत नहीं हो, बावजूद इसके कि कठिनाइयाँ अपार हों।

रोजा लक्जमबर्ग के ठीक उन्ही लेखों को पुनर्प्रकाशित करने के माध्यम से जिनमें वे गलत थीं, पॅाल लेवी अब पूँजीपति वर्ग—और, नतीजतन, इसके एजेण्ट, दूसरे और ढाईवें अन्तरराष्ट्रीय—की अनुकम्पा की छाया में आना चाहता है। इसका जवाब हम एक सुविदित रूसी नीतिकथा[4] की दो पंक्तियों को उद्धृत कर के देंगे : “गरुड़ कभी-कभार मुर्गियों से भी नीची उड़ान भर सकते हैं लेकिन मुर्गियाँ कभी गरुड़ों की ऊँचाई को छू नहीं सकतीं।” रोजा लक्जमबर्ग पोलैंड के आजादी के मामले में गलती पर थीं; 1903 में मेनशेविज्म के अपने आकलन के मामले में वे गलती पर थीं; पूँजी संचय के सिद्धान्त के मामले में वे गलती पर थीं; वे जुलाई 1914 में गलती पर थीं जब प्लेखानोव वन्देर्वेल्दे, काउत्स्की और दूसरों के साथ मिलकर उन्होंने मेनशेविकों और बोलशेविकों के बीच एकता की वकालत की थी; 1918 में जेल में उन्होंने जो लेखन किया उसमें वे गलती पर थीं (इसमें से अधिकांश गलतियों को उन्होंने 1918 के अन्त और 1919 के आरम्भ में सुधार लिया।) लेकिन इन गलतियों के बावजूद वे गरुड़ थीं और हमारे लिए वही बनी रहेंगी। और न केवल पूरी दुनिया के कम्युनिस्ट उनकी स्मृति को अपने ह्रदय में संजोये रखेंगे बल्कि उनकी जीवनी और उनकी सम्पूर्ण रचनायें (जिसके प्रकाशन में जर्मन कम्युनिस्ट असाधारण रूप से विलम्ब कर रहे हैं, जिसे, भयानक संघर्ष में वे जैसा जबरदस्त नुकसान उठा रहे हैं उसके मद्देनजर, आंशिक रूप से ही क्षम्य समझा जा सकता है) दुनिया भर के कम्युनिस्टों के अनेक पीढ़ियों के प्रशिक्षण लिए उपयोगी पाठ्य-पुस्तकों की भूमिका निभायेंगी। “4 अगस्त, 1914[5] के बाद से जर्मन सामाजिक-जनवाद एक बदबुदार लाश है”—यह वक्तव्य रोजा लक्जमबर्ग के नाम को अन्तरराष्ट्रीय मजदूर वर्ग के आन्दोलन के इतिहास में प्रसिद्ध करेगा। और, जाहिरा तौर पर, मजदूर-वर्गीय आन्दोलन के पिछवाड़े में भी, जहाँ गोबर के ढेर पर पॅाल लेवी, श्वेइदेमान, काउत्स्की जैसी मुर्गियाँ और उनकी पूरी बिरादरी महान कम्युनिस्टों द्वारा की गयी गलतियों पर कुड़कुड़ानी झाड़ेंगी। सबकी अपनी अपनी फितरत है।

जहाँ तक सेर्राती का सवाल है, वह एक सड़े अण्डे की तरह है जो जोर की आवाज और खास तौर पर कडुवी बदबू के साथ फूटता है। “उसके” कांग्रेस के एक प्रस्ताव से, जो कम्युनिस्ट अन्तरराष्ट्रीय के कांग्रेस के फैसलों के प्रति अधीनता के लिए तैयार होने के घोषणा करती है, भ्रमित होने कि गुञ्जाइश क्या कम है, जो उसके बाद वह बूढ़े लाज्ज़ारी को कांग्रेस में भेजता है और अन्त में मजदूरों को घोड़ा बेचनेवालों की बेशर्मी के साथ धोखा देता है? इतालवी कम्युनिस्ट जो इटली में क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग की एक असली पार्टी को प्रशिक्षित कर रहे हैं, अब इटली की मेहनतकश जनता को राजनीतिक धोखधड़ी और मेनशेविकवाद का वास्तविक सबक दिखा सकते हैं। इसका उपयोगी, निरोधक प्रभाव जल्दी ही महसूस नहीं होगा, न ही ऐसा अनेक ऐसे वास्तविक सबकों को दुहराये जाने के बिना होगा, लेकिन इसे महसूस किया जायेगा। इतालवी कम्युनिस्टों के विजय सुनिश्चित है यदि वे अपने को जनता से अलगाव में न डाल लें, यदि वे आम कार्यकर्ताओं के समक्ष सेर्राती की सभी धोखाधड़ियों का व्यावहारिक रूप से पर्दाफाश करने के कठिन काम में धैर्य न खोयें, यदि वे जब भी सेर्राती “अ” बोले तो “ऋण अ” बोलने के बहुत ही आसान और खतरनाक प्रलोभन के वशीभूत न हों, यदि वे निरन्तर जनता को एक क्रान्तिकारी विश्व दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रशिक्षित करें और उन्हें क्रान्तिकारी कारर्वाई के लिए तैयार करें, यदि वे इसी के साथ फासीवाद के व्यावहारिक और शानदार (हालांकि महंगे) वास्तविक सबकों का व्यावहारिक लाभ उठायें।

लेवी और सेर्राती अपने आप में लाक्षणिक नहीं हैं। वे लक्षण हैं निम्न-पूँजीवादी जनवाद के चरम वामपन्थ के आधुनिक किस्म के, “विपरीत पक्ष” के शिविर के, अन्तरराष्ट्रीय पूँजीपतियों के शिविर के, उस शिविर के जो हमारे खिलाफ है। गोम्पर्स से सेर्राती तक “उनका” पूरा शिविर हमारे पीछे हटाने पर, हमारे “नीचे उतरने” पर दीदें फाड़ रहा है, हर्षोन्मत्त हो रहा है या फिर घड़ियाली आँसू बहा रहा है। उन्हें दीदें फाडने दो, अपने विदूषकीय करतब करने दो। सबकी अपनी अपनी फितरत है। लेकिन हमें कोई भ्रम नहीं पालना चाहिए या हताशा के वशीभूत नहीं होना चाहिए। यदि हम अपनी गलतियों को स्वीकार करने से नहीं डरते, बार-बार उन्हें सुधरने की कोशिश करने से नहीं डरते—तो हम शिखर तक जरूर पहुँचेंगे। गोम्पर्स से सेर्राती तक के अन्तरराष्ट्रीय ब्लॅाक के मनोरथ की असफलता तय है।

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[1] यह लेख पूरा नहीं किया गया।

[2] ‘स्मेना वेख’– यह प्राग से 1912 में प्रकाशित लेखों के संकलन का शीर्षक था, बाद में इसी नाम से अक्तूबर 1921 मार्च 1922 तक पेरिस से एक पत्रिका प्रकाशित हुई। यह श्वेत उत्प्रवासी बुधिजीवियों के बीच 1921 में पैदा हुए एक सामाजिक-राजनीतिक प्रवृत्ति के समर्थकों का मुखपत्र था और इसे उन पुराने, बुर्जुआ बुद्धिजीवी वर्ग के एक हिस्से का समर्थन हासिल था जिन्होंने विभिन्न कारणों से देश नहीं छोड़ा था।

सोवियत रूस में नयी आर्थिक नीति को लागू किये जाने के पश्चात पूँजीवादी तत्वों में हुई किंचित बहाली ने इस प्रवृत्ति के सामाजिक बुनियाद का काम किया। इस प्रवृत्ति के मतावलम्बियों ने जब देखा कि विदेशी सैन्य दखलन्दाजी सोवियत शासन को उखाड़ने में सफल नहीं हुई वे सोवियत सरकार के साथ सहयोग की वकालत करने लगे, सोवियत राज्य के पूँजीवादी पुनरुद्धार की आशा में। नयी आर्थिक नीति को उन्होंने सोवियत शासन का पूँजीवादी पुनर्स्थापना की दिशा में हुई तरक्की माना। उनमें से कुछ निष्ठापूर्वक सोवियत सरकार के साथ सहयोग करने और देश के आर्थिक पुनर्जीवन को बढ़ावा देने के लिए तैयार थे। आगे चलकर उनमें से अधिकांश ने प्रति-क्रान्ति का साथ दिया।

लेनिन द्वारा इस प्रवृत्ति के गुणों का वर्णन इस खण्ड में किया है (देखें पृ.285-86)।

[3] जुडास गोलोव्लीयोव– एक जमीन मालिक और एम. वाई. सल्तिकोव-श्चेद्रिन के गोलोव्लीयोव परिवार का पात्र। उसके कट्टरता, पाखण्ड और संवेदनहीनता के लिए उसे जुड़ास का नाम मिला। जुडास गोलोव्लीयोव का नाम इन नकारात्मक गुणों का समानार्थक बन गया।

[4] यहाँ इवान kriक्रिलोव की नीतिकथा गरुड़ और मुर्गियाँ का जिक्र है।

[5] 4 अगस्त, 1914 को राईसटैग में सामाजिक-जनवादी धड़े ने शाही सरकार को 50,000 लाख मार्क का युद्ध ऋण देने के पक्ष में पूँजीवादी प्रतिनिधियों के साथ मतदान किया, और इस तरह विल्हेल्म द्वितीय की साम्राज्यवादी नीतियों का अनुमोदन किया।

 

 

 

 

रूसी क्रांति का दर्पण : लियो तालस्ताय, 1908

 

कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन और उसका ढांचा, 1921

 

 

 

 

 

 

 

 

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